संयुक्त राष्ट्र(राजीव शर्मा): भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड की जो उसे अनुचित प्रस्तुति मानता है, उस पर आपत्ति जताई है और सदस्य देशों से सत्यापित निष्कर्षों तथा अभी तक पुष्ट न हुए आरोपों में अंतर करने का आग्रह किया है।
मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति (UNGA Third Committee) के समक्ष बोलते हुए विदेश मंत्रालय की उपसचिव बरखा ताम्राकार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार चर्चाओं को राजनीतिक विचारों के बजाय पारदर्शिता, सहयोग और निष्पक्षता से निर्देशित होना चाहिए।
उनका यह बयान जबरन विलुप्ति या अनैच्छिक विलुप्ति पर संयुक्त राष्ट्र कार्यदल (UN Working Group on Enforced or Involuntary Disappearances) से जुड़े मुद्दे पर हुई चर्चा के दौरान दिया गया। ताम्राकार ने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों के साथ जुड़ने के लिए प्रतिबद्ध है, बशर्ते यह प्रक्रिया रचनात्मक संवाद पर आधारित हो और देशों को चयनात्मक रूप से निशाना न बनाए।
उन्होंने प्रतिनिधियों से अधूरी जानकारी या असत्यापित दावों से व्यापक निष्कर्ष निकालने से सावधान रहने का आग्रह किया। उनके अनुसार, मानवीय मुद्दों से जुड़ी रिपोर्टों और संचारों को सटीक रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए और पर्याप्त साक्ष्य के बिना उन्हें निश्चित निर्णय नहीं माना जाना चाहिए।
भारत ने यह भी दोहराया कि वह उचित दस्तावेज़ीकरण के साथ और मान्यता प्राप्त अंतरराष्ट्रीय माध्यमों से उठाए गए विशिष्ट मामलों पर विचार करने को तैयार है। हालांकि, नई दिल्ली ने उन प्रयासों पर आपत्ति जताई, जिन्हें उसने स्वतंत्र रूप से स्थापित न हुए आरोपों के जरिए देश को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास बताया।
दिल्ली प्रदर्शनों को लेकर मतभेद
ये टिप्पणियाँ ऐसे समय में आई हैं, जब नई दिल्ली में युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों पर पुलिस की कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय जांच बढ़ रही है। जिनेवा में स्थित 20 से अधिक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने मंगलवार को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा कथित अत्यधिक बल प्रयोग पर चिंता जताई।
विशेषज्ञों ने भारतीय अधिकारियों से रिपोर्ट की गई उल्लंघनों की जांच करने और प्रभावित लोगों को न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने का आग्रह किया। इन चिंताओं ने राजधानी में प्रदर्शनों को संभालने को लेकर भारत और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रतिनिधियों के बीच चल रहे आदान-प्रदान को और बढ़ा दिया है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने पहले प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान प्रदर्शनकारियों, आयोजकों, सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों, वकीलों और पत्रकारों की बड़े पैमाने पर हिरासत की रिपोर्टों पर चिंता जताई थी।
भारत ने इस आलोचना का जोरदार विरोध किया है। पिछले सप्ताह नई दिल्ली ने देश में युवाओं से जुड़े एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञ की टिप्पणियों को खारिज कर दिया था, उन दावों को अफवाह बताया और निष्कर्ष निकालने से पहले उचित सत्यापन की मांग की।
सरकार ने प्रदर्शनों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई और उन्हें अनावश्यक तथा भारत के घरेलू मामलों में अस्वीकार्य हस्तक्षेप बताया।
भारत ने सहयोग पर जोर दिया, चयनात्मक जांच को खारिज किया
संयुक्त राष्ट्र की बैठक में ताम्राकार ने जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्र ऐसे नहीं चलने चाहिए कि वे अलग-अलग देशों पर राजनीतिक दबाव बनाने का साधन बन जाएं।
भारत का पक्ष विश्वसनीय दस्तावेज़ीकरण, संतुलित रिपोर्टिंग और अंतरराष्ट्रीय मूल्यांकनों में देशों के साथ समान व्यवहार की आवश्यकता पर केंद्रित है। उचित रूप से पुष्ट की गई चिंताओं का जवाब देने के लिए तैयार रहने का पुनः दावा करते हुए नई दिल्ली ने कहा कि असत्यापित आरोपों का उपयोग उसके लोकतांत्रिक संस्थानों या मानवाधिकार रिकॉर्ड के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
प्रदर्शनों को लेकर घटनाओं की व्याख्या और कथित अधिकारों के उल्लंघनों की जांच में अंतरराष्ट्रीय निकायों की भूमिका को लेकर भारत और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रतिनिधियों के बीच नवीनतम आदान-प्रदान जारी मतभेदों को दर्शाता है।
