हिमाचल हाईकोर्ट सख्त: धारा 118 के तहत 10 साल के भूमि अनुमोदनों का रिकॉर्ड तलब, बारोग हाई-राइज़ पर सवाल

हिमाचल (राजीव शर्मा):हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रदेश भर में गैर-कृषकों को दी गई भूमि खरीद अनुमतियों का विस्तृत ब्यौरा मांगा है और हिमाचल प्रदेश किरायेदारी तथा भूमि सुधार अधिनियम, 1972 की धारा 118 के तहत अपनाई गई प्रक्रिया पर सरकार से सवाल पूछे हैं। अदालत ने बारोग में हो रहे हाई-राइज़ निर्माण और पहाड़ी क्षेत्र में भवन नियमों की संभावित अवहेलना को लेकर भी चिंता जताई है।

13 अक्टूबर को जारी आदेश में जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को पिछले 10 वर्षों के दौरान धारा 118 के तहत प्राप्त आवेदनों की जानकारी देने का निर्देश दिया। अदालत दी गई मंजूरियों, खारिज किए गए आवेदनों और उन आधारों का विवरण चाहती है, जिन पर प्राधिकरणों ने ये निर्णय लिए।

सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि आवेदनों के मूल्यांकन हेतु किन मानकों का उपयोग किया जाता है और क्या इस प्रावधान के तहत जारी की गई अनुमतियां आवेदन शुल्क, प्रोसेसिंग फीस, स्टाम्प ड्यूटी तथा अन्य संबंधित भुगतानों के माध्यम से राज्य राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधवालिया और न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी की अध्यक्षता वाली बेंच ने विशेष रूप से बारोग पटवार सर्कल से जुड़े आंकड़ों की जांच की, जहां गैर-कृषकों को 187 अनुमतियां दी गई थीं। इनमें से 64 मंजूरियां विभिन्न उद्देश्यों के लिए भूमि खरीदने से जुड़ी थीं, जबकि शेष 123 फ्लैट या अन्य निर्मित संपत्तियों के अधिग्रहण से संबंधित थीं।

शिमला, नाहन के आंकड़े ध्यान खींचते हैं

राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशक में शिमला जिले में 801 अनुमतियां जारी की गई थीं। नाहन में प्राधिकरणों ने 270 अनुमतियां दीं, जिनमें 150 औद्योगिक या पर्यटन संबंधी गतिविधियों तथा 111 आवासीय या पर्यटन उद्देश्यों के लिए थीं।

अदालत धारा 118 के तहत अनुमत भूमि लेन-देन के व्यापक पैटर्न की जांच कर रही है, जो लागू कानून के तहत कृषक के रूप में योग्य न होने वाले व्यक्तियों को भूमि हस्तांतरण को नियंत्रित करती है। इसके सवाल ऐसी मंजूरियां देने के आधार और यह जानने पर केंद्रित हैं कि क्या निर्णय प्रक्रिया लगातार लागू की जा रही है।

बारोग का निर्माण न्यायिक जांच में

भूमि अनुमतियों के अलावा, बेंच ने बारोग में हो रहे निर्माण के पैमाने और स्वरूप पर भी चिंता व्यक्त की, जहां कई हाई-राइज़ आवासीय परियोजनाएं जांच के दायरे में आई हैं।

अदालत के समक्ष रखी गई सामग्री के अनुसार, क्षेत्र में जांचे गए 21 रियल एस्टेट परियोजनाओं में से आठ में छह मंजिल से अधिक ऊंची इमारतें पाई गईं। संबंधित अनुमतियां 11 मई, 2026 से पहले दी गई थीं, जब छह मंजिल से अधिक निर्माण पर प्रतिबंध लागू थे।

अदालत ने देखा कि डेवलपर्स ने निर्धारित ऊंचाई सीमा से अधिक इमारतें बनाने से पहले धारा 118 के तहत मंजूरियां हासिल की थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि अनुमत सीमा से अधिक ऊंची संरचनाओं वाली परियोजनाओं को आवश्यक मंजूरियां कैसे मिलीं।

बेंच ने यह भी चिंता जताई कि क्या अपार्टमेंट ब्लॉक पहाड़ी क्षेत्रों की नाजुक और असमान भूमि के लिए उपयुक्त निर्माण मानकों के अनुरूप हैं। इमारतों के बीच की दूरी, अग्नि-सुरक्षा प्रावधान और आसपास के ब्लॉकों के बीच सेटबैक इस कार्यवाही के दौरान उठाए गए मुद्दों में शामिल थे।

सरकार से 25 मीटर से अधिक ऊंची इमारतों पर जवाब मांगा

अदालत ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में अपार्टमेंट और कॉलोनियों के विकास के लिए लागू नियमों में अधिकतम भवन ऊंचाई 25 मीटर निर्धारित है, जो संरचना के आधार पर आमतौर पर छह या सात मंजिलों के बराबर होती है।

इस पृष्ठभूमि में राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि निर्धारित ऊंचाई से अधिक वाली परियोजनाओं के लिए मंजूरियां कैसे जारी की गईं। कार्यवाही में 21 बिल्डरों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें निर्माण रोकने के निर्देश देने वाले नोटिस मिले हैं।

बेंच ने बड़े पैमाने के विकास के लिए अनिवार्य पर्यावरण मंजूरियों का मुद्दा भी उठाया, जिससे मंजूरी प्रक्रिया और निर्माण नियमों के अनुपालन पर ध्यान केंद्रित हुआ है।

यह मामला हिमाचल प्रदेश के हिल स्टेशनों में भूमि खरीद अनुमतियों, नियोजन मंजूरियों तथा भवन एवं पर्यावरण मानकों के अनुपालन के बीच समन्वय पर सवाल खड़े करता है।

हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई 7 दिसंबर के लिए तय की है। अदालत के सवालों पर राज्य सरकार के जवाब से धारा 118 की अनुमतियों और बारोग की परियोजनाओं से जुड़ी नियामक कार्रवाई के बारे में आगे का विवरण मिलने की उम्मीद है।

By Rajeev Sharma

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