नई दिल्ली(राजीव शर्मा):कोच्चि स्थित आईसीएआर-सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईसीएआर-सीएमएफआरआई) ने उपभोक्ताओं को सलाह दी है कि वे सिर्फ किसी खास भौगोलिक इलाके की मछलियों में पैरासाइट संक्रमण मिलने की खबरों के आधार पर टूना या बाज़ार में मिलने वाली दूसरी मछलियों को खाना न छोड़ें। संस्थान ने कहा कि टूना समेत भारतीय तट पर जांची गई मछलियों में हानिकारक पैरासाइट संक्रमण के बाहरी लक्षण नहीं दिखे हैं और दूसरे इलाकों में मिली ऐसी जानकारी को भारतीय जलक्षेत्र में पकड़ी गई मछलियों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
यह सलाह ब्राज़ील के पास अटलांटिक महासागर की मछलियों पर हुई एक स्टडी में स्किपजैक टूना में पैरासाइट मिलने की खबरों के बाद जारी की गई है। आईसीएआर-सीएमएफआरआई ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पैरासाइट की मौजूदगी और संख्या अलग-अलग मछलियों और भौगोलिक इलाकों में अलग-अलग हो सकती है। यह पारिस्थितिक स्थितियों और कोपपोड्स जैसे इंटरमीडिएट या सेकेंडरी होस्ट की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
आईसीएआर-सीएमएफआरआई के निदेशक डॉ. ग्रिन्सन जॉर्ज ने बताया कि संस्थान के वैज्ञानिक मछली की बायोलॉजी से जुड़े अध्ययन के तहत नियमित रूप से स्किपकैक टूना जैसी मछलियों की जांच करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर उनमें किसी तरह की असामान्यता या परजीवी की मौजूदगी देखते हैं। उन्होंने कहा कि संस्थान द्वारा जांची गई मछलियों में हानिकारक परजीवी के संक्रमण के बाहरी लक्षण नहीं दिखे।
संस्थान ने आगे बताया कि दुनिया भर में मछली के स्टॉक या आबादी में अंतर करने के लिए परजीवी की मौजूदगी में होने वाले बदलावों का इस्तेमाल संकेतकों के तौर पर किया जाता रहा है। इसलिए, किसी एक भौगोलिक इलाके की मछली से जुड़ी जानकारी को अपने आप दूसरे इलाके में पाई जाने वाली उसी प्रजाति की मछली पर लागू नहीं किया जा सकता।
खाने की सुरक्षा से जुड़ी एक अतिरिक्त सावधानी के तौर पर, आईसीएआर-सीएमएफआरआई ने सलाह दी कि मछली को संभालने और बनाते वक्त उसके अंदरूनी अंगों (जैसे आंत वगैरह) को सही तरीके से और तुरंत निकाल देना ज़रूरी है। आमतौर पर सफाई और प्रोसेसिंग के दौरान आंत और दूसरे अंदरूनी अंगों को निकाल दिया जाता है। सही तरीके से पकाने पर परजीवी मर जाते हैं और खाने से जुड़े सुरक्षा जोखिम काफी कम हो जाते हैं।
संस्थान ने बताया कि कुछ देशों में सांस्कृतिक परंपराओं के तहत कच्चा या हल्का पका हुआ समुद्री भोजन खाया जाता है। ऐसे मामलों में जोखिम ज़्यादा हो सकता है, खासकर तब जब उस इलाके में परजीवी का प्रसार ज़्यादा हो और उसकी ठीक से जाँच न की गई हो। भारत में, सीफूड को आम तौर पर तेज़ आँच पर पकाया जाता है, जिससे भोजन की अतिरिक्त सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
आईसीएआर-सीएमएफआरआई ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उपभोक्ताओं को टूना या बाज़ार में मिलने वाली दूसरी मछलियों को खाने से सिर्फ इसलिए नहीं बचना चाहिए, क्योंकि किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की मछलियों में परजीवी पाए गए हैं। संस्थान ने उपभोक्ताओं को सलाह देते हुए कहा कि वे मछली और दूसरे समुद्री भोजन के पोषक तत्वों का फायदा उठाते हुए संभावित जोखिमों को कम करने के लिए उन्हें सही तरीके से संभालने, साफ करने और पकाने के तरीकों का पालन करें।
