नई दिल्ली (राजीव शर्मा) नॉर्डिक समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नॉर्डिक देशों के शीर्ष नेताओं को भारतीय शिल्प और सांस्कृतिक विविधता से जुड़ी विशेष भेंटें देकर द्विपक्षीय रिश्तों में सांस्कृतिक जुड़ाव बढ़ाने की कोशिश की। चुनी गई चीज़ें उस देश की भौगोलिक पहचान और स्थानीय संवेदनाओं के अनुरूप रखी गईं, ताकि उपहारों में अर्थ और प्रतीकात्मकता दोनों आएं।
फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ऑरपो को राजस्थान की प्रसिद्ध कमल-तलई पिचवाई पेंटिंग दी गई। नथद्वारा शैली से प्रेरित यह कलाकृति कमल से भरपूर जल और प्राकृतिक संतुलन को दर्शाती है, जिसे फिनलैंड की झीलों वाली छवि से जोड़ा गया बताया गया।
आइसलैंड की प्रधानमंत्री क्रिस्ट्रुन फ्रोस्टाडोटिर को तेनजिंग नॉरगे द्वारा 1953 में उपयोग की गई हिमकड़ी की प्रतिकृति भेंट की गई। लकड़ी के तने और स्टील फिनिश वाली यह प्रतिकृति साहस, चुनौती और प्रकृति के प्रति सम्मान का संकेतती है—वह अर्थ जो आइसलैंड की ग्लेशियर-समृद्ध और पर्वतीय संस्कृति से मेल खाता है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन को विद्री (बिद्री) चांदी इनले का एक कलात्मक फूलदान सौंपा गया। हैदराबाद व डेक्कन रीति की इस धातुकला में बारीक नक्काशी और ज्यामितीय पैटर्न देखने को मिलते हैं, जिन्हें डेनिश शिल्प की सरलता और सुंदरता के साथ एक संवाद स्थापित करते बताया गया।
स्वीडन में क्राउन प्रिंसेस विक्टोरिया को प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी किताब “Convenient Action: Continuity for Change” भेंट की। स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन को शान्तिनिकेतन से बनी पारंपरिक चमड़े की एक हस्तनिर्मित बैग और रवींद्रनाथ टैगोर की चुनिंदा रचनाएँ दी गईं; शान्तिनिकेतन शिल्प को भौगोलिक संकेत (GI) सुरक्षा प्राप्त है और यह बिर्भूम के कारीगरों को सहारा देता है।
इसके अतिरिक्त, मोदी ने मणिपुर के लोकटक झील के आसपास की पहाड़ियों की लोकटक चाय और लद्दाख के चांगथांगी बकरियों की ऊन से बनी पारंपरिक पश्मीना स्टोल भी भेंट की—दोनों उपहार स्थानीय संसाधनों व टिकाऊ कारीगरी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार ये भेंट केवल शिष्टाचार नहीं थीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक कहानियों और क्षेत्रीय हस्तशिल्प के माध्यम से लोगों के स्तर पर सम्बन्धों को मजबूत करने की नीयत से चुनी गईं। अधिकारियों ने कहा कि इस तरह की सांस्कृतिक डिप्लोमेसी से आपसी समझ बढ़ती है और द्विपक्षीय साझेदारी को नई पहचान मिलती है।
