नई दिल्ली (राजीव शर्मा): भारत ने आगाह किया है कि अमेरिका का नया प्रतिबंध कानून द्विपक्षीय संबंधों के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है। इसके साथ ही भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि देश अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।
यह प्रतिक्रिया अमेरिकी कांग्रेस द्वारा ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पारित किए जाने के बाद आई है। यह कानून राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है जो रूसी तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं।
भारत के लिए यह घटनाक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि रूसी कच्चा तेल देश की ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। नई दिल्ली लगातार यह दोहराती रही है कि तेल खरीद से जुड़े उसके फैसले घरेलू ऊर्जा आवश्यकताओं, बाजार की परिस्थितियों और आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की जरूरत से तय होते हैं।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत पिछले कई महीनों के दौरान हुई वार्ताओं में अमेरिकी अधिकारियों के समक्ष अपनी चिंताएं पहले ही दर्ज करा चुका है। मंत्रालय के अनुसार, भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि प्रस्तावित कदमों के परिणाम न केवल दोनों देशों के संबंधों पर बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ सकते हैं।
भारत अब इस कानून के असर का आकलन कर रहा है और उसने संकेत दिया है कि स्थिति के अनुसार वह घरेलू व्यापार और उद्योग समूहों के साथ समन्वय बनाए रखेगा।
यह कानून भारतीय सामानों पर अपने-आप 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं करता है। इसके बजाय, यह अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ ऐसे कदम उठाने का अधिकार देता है। लिहाजा, भारत पर इसका अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि वाशिंगटन इन शक्तियों का इस्तेमाल किस तरह करने का फैसला करता है।
यह मुद्दा भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों के बेहद संवेदनशील दौर में सामने आया है, जहां व्यापार और बाजार तक पहुंच पहले से ही दोनों देशों के बीच बातचीत का एक अहम हिस्सा रहे हैं। किसी भी प्रकार के अतिरिक्त टैरिफ उपाय भारतीय निर्यातकों पर दबाव बढ़ा सकते हैं और व्यापक वाणिज्यिक समझौतों पर बातचीत को जटिल बना सकते हैं।
वहीं दूसरी ओर, रूसी तेल की खरीद कम करना नई दिल्ली के लिए कोई आसान विकल्प नहीं है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अप्रत्याशित बाधाओं से खुद को सुरक्षित रखने के लिए उसने कई क्षेत्रों से आपूर्ति के स्रोत जुटाए हैं।
सरकार ने दोहराया कि ऊर्जा सुरक्षा उसकी नीति के केंद्र में बनी रहेगी।
सरकार के अनुसार, भारत की रणनीति वैश्विक बाजारों में आने वाले बदलावों के अनुरूप प्रतिक्रिया देते हुए विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं से ऊर्जा हासिल करने की रहेगी। यह नजरिया नई दिल्ली को नए अमेरिकी कदमों के आर्थिक प्रभावों का आकलन करते हुए अपने विकल्पों को खुला रखने की सुविधा देता है।
लिहाजा, आने वाले हफ्ते दोनों पक्षों के लिए अहम साबित हो सकते हैं। वाशिंगटन को यह तय करना होगा कि नए कानून के तहत मिले अधिकारों का वह कितना कड़ा इस्तेमाल करता है, जबकि भारत से उम्मीद की जाती है कि वह अपने वाणिज्यिक हितों की रक्षा और विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति तक पहुंच बनाए रखने के लिए अमेरिकी अधिकारियों के साथ संपर्क साधेगा।
नई दिल्ली के सामने चुनौती यह होगी कि वह 1.4 अरब से अधिक की आबादी वाले देश की ऊर्जा आवश्यकताओं से समझौता किए बिना प्रतिबंधों से पैदा हुए दबाव का संतुलन कैसे बनाती है।
