नई दिल्ली(राजीव शर्मा): व्यापारियों को किए जाने वाले चुनिंदा उच्च-मूल्य वाले यूपीआई भुगतानों पर प्रस्तावित 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने को टाल दिया गया है। प्राधिकरणों ने इसे दिवाली के बाद तक लागू करने का निर्णय लिया है। मूल रूप से 15 अक्टूबर से प्रभावी होने वाला यह शुल्क अब अगले साल जनवरी में लागू होने की उम्मीद है, हालांकि संशोधित कार्यान्वयन तिथि की अभी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
त्योहारी खरीदारी के दौरान प्रस्तावित शुल्क को लेकर आई आलोचना और चिंताओं के बीच यह निर्णय लिया गया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने कहा कि उसकी यूपीआई और सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी ने इसे दिवाली के तुरंत बाद लागू करने का निर्णय लिया है। सटीक तिथि अलग से सूचित की जाएगी।
15 सितंबर को घोषित प्रस्तावित एमडीआर घरेलू यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) लेनदेन पर लागू होगा, जब ग्राहक 2,000 रुपये से अधिक का भुगतान व्यापारियों को करते हैं। हालांकि, व्यक्तियों के बीच भुगतान और योग्य कम-मूल्य वाले लेनदेन बिना किसी शुल्क के जारी रहेंगे।
एनपीसीआई के अनुसार, 2,000 रुपये से कम के लेनदेन व्यापारियों को किए गए कुल यूपीआई भुगतानों की मात्रा का 95% से अधिक हिस्सा हैं। ये लेनदेन प्रस्तावित शुल्क संरचना से बाहर रहेंगे। सरकार ने यह भी कहा है कि छोटे व्यापारियों को प्राप्त होने वाले भुगतान इस शुल्क से मुक्त रहेंगे।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत व्यापारियों को 2,000 रुपये से अधिक के योग्य लेनदेन पर 0.4% एमडीआर का सामना करना पड़ेगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतानों के लिए शुल्क प्रति लेनदेन अधिकतम 300 रुपये तक सीमित रहेगा।
सरकार ने प्रस्तावित यूपीआई शुल्कों का बचाव किया
इस प्रस्ताव पर विपक्ष की आलोचना हुई, जिसके बाद सरकार ने यह बताया कि यह शुल्क क्यों विचाराधीन है। अधिकारियों ने बताया कि प्रस्तावित दर पारंपरिक कार्ड भुगतानों से जुड़े सामान्य मर्चेंट शुल्कों से कम है।
सरकार के अनुसार, क्रेडिट कार्ड प्रोसेसिंग शुल्क आमतौर पर 1.5% से 2.5% के बीच होते हैं, जबकि डेबिट कार्ड शुल्क 0.90% तक हो सकते हैं। सरकार का तर्क है कि प्रस्तावित यूपीआई दर व्यापारियों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने का तुलनात्मक रूप से किफायती तरीका देगी।
सरकार ने यूपीआई लेनदेन के बढ़ते आकार की ओर भी इशारा किया और कहा कि भुगतान नेटवर्क को बनाए रखने के लिए तकनीक, साइबर सुरक्षा, ढांचागत विश्वसनीयता और ग्राहक सहायता में निरंतर निवेश जरूरी है।
एमडीआर कौन चुकाएगा?
वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट न तो सरकारी कर है और न ही एनपीसीआई द्वारा वसूला जाने वाला शुल्क है। इसके बजाय, यह राशि बैंकों और भुगतान ऐप प्रदाताओं सहित भुगतान प्रणाली के प्रतिभागियों में वितरित की जाएगी, ताकि परिचालन लागत को कवर करने और नेटवर्क के आगे के विकास में मदद मिल सके।
यह प्रस्तावित बदलाव 2020 में शुरू किए गए शून्य-एमडीआर ढांचे से हटने का संकेत होगा। बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों ने मर्चेंट लेनदेन शुल्क के बिना यूपीआई पारिस्थितिकी तंत्र को चलाने की दीर्घकालिक टिकाऊपन पर चिंता जताई है।
फिलहाल, स्थगिती से त्योहारी सीजन के दौरान व्यापारियों को अस्थायी राहत मिली है। व्यापारी और भुगतान सेवा प्रदाताओं को प्रस्तावित शुल्क कब लागू होंगे और अंतिम कार्यान्वयन नियम कैसे लागू होंगे, यह तय करने के लिए संशोधित अधिसूचना का इंतजार करना होगा।
