शिमला(राजीव शर्मा): हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने छह पूर्व चीफ पार्लियामेंट्री सेक्रेटरीज़ (CPS) द्वारा सरकारी आवास के कब्जे को पश्चगत प्रभाव से नियमित किए जाने के सरकार के फैसले के संबंध में विस्तृत स्पष्टीकरण माँगा है।
एक डिवीजन बेंच, जिसका संचालन चीफ जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंदर नेगी ने किया, ने चीफ सेक्रेटरी से उस परिस्थितियों का विस्तृत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है जिनमें पूर्व CPS को सरकारी आवास बनाए रखने की अनुमति दी गई और यह भी कि क्या ऐसी समान छूट अन्य सरकारी कर्मचारियों को भी दी गई है।
बेंच ने यह भी सरकार से पूछा है कि नियमितीकरण के इस निर्णय को निलंबित (abeyance) क्यों न रखा जाए।
दिशानिर्देश उस समय दिए गए जब बेंच ने आवास संबंधी मूल सरकारी फाइल का परीक्षण किया। अदालत ने यह देखा कि नियमितीकरण की प्रक्रिया उस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप के बाद गति पकड़ती प्रतीत होती है।
रिकाॅर्ड के अनुसार, अधिकारियों ने पहले 6 जून, 2025 को तब कब्जा खारिज करने की जिम्मेदारी शुरू न करने का फैसला लिया था जब एक स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। फाइल में बाद में वैकल्पिक सरकारी आवास की अनुपस्थिति का उल्लेख था और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार करते हुए लाइसेंस शुल्क वसूल करने पर विचार किया जा रहा था।
मामला बाद में उस समय आगे बढ़ाया गया जब एडवोकेट जनरल ने मौखिक सलाह दी थी कि लाइसेंस शुल्क वसूल करने के विषय पर विचार करें। प्रस्ताव को बाद में मुख्यमंत्री और कैबिनेट के समक्ष रखा गया।
राज्य सरकार ने अंततः 4 मई, 2026 को इसे पृष्ठभूमि से नियमित करने को मंजूरी दे दी, जिसका प्रभाव 14 नवंबर, 2024 से माना गया। कब्जाधारकों को हिमाचल प्रदेश ऑलॉटमेंट ऑफ गवर्नमेंट रेजिडेन्स (जनरल पूल) रूल्स, 1994 के नियम 24 के तहत सामान्य लाइसेंस शुल्क का भुगतान करने पर आवास रखने की अनुमति दी गई।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाए कि यह छूट किस तरह दी गई क्योंकि, अदालत के अनुसार, पूर्व CPS द्वारा ऐसी किसी छूट के लिए आवेदन नहीं किया गया था।
बेंच ने चीफ सेक्रेटरी से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या पहले भी अन्य सरकारी कर्मचारियों को इसी तरह की छूट दी गई है। साथ ही यह भी पूछा कि छह पूर्व CPS को बिना उनका आवेदन लिए यह लाभ क्यों दिया गया।
अदालत ने यह भी मांगा है कि राज्य रिकॉर्ड पर वह दंडात्मक किराया (penal rent) की राशि पेश करे जो अन्यथा कब्जाधारकों से वसूल की जानी थी और साफ़ करे कि क्या पृष्ठगत रूप से नियमितीकरण मनमाना था या लागू नियमों के अधिकार क्षेत्र के बाहर था।
एक कड़े प्रतिवेदन में बेंच ने प्रश्न उठाया कि क्या राज्य ने वास्तव में “मुँह दिखाओ, मैं तुम्हें नियम दिखाऊँगा” जैसे सिद्धांत का अनुसरण किया, खासकर जब चीफ पार्लियामेंट्री सेक्रेटरीयों की नियुक्तियाँ पहले ही रद्द की जा चुकी थीं।
अदालत ने यह भी कहा कि यह मामला संभवतः उस समय तक जांच के दायरे में नहीं आता यदि वर्तमान कार्यवाही शुरू न की जाती।
अब राज्य से पूछा गया है कि उसके निर्णय पर रोक क्यों न लगाई जाए। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त, 2026 को होगी, जब सरकार की प्रतिक्रिया पर विचार किया जाएगा।
