NHPC की जलविद्युत परियोजनाओं पर वन मंजूरी की देरी भारी, संसदीय समिति ने सरकार को दिए सुझाव

नई दिल्ली(राजीव शर्मा): वन मंजूरी हासिल करने में देरी राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) की कई परियोजनाओं के लिए बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। एक संसदीय समिति ने चेतावनी दी है कि लंबी मंजूरी प्रक्रिया भारत के स्वच्छ ऊर्जा विस्तार को धीमा कर रही है और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पनबिजली परियोजनाओं को प्रभावित कर रही है।

लोक उपक्रमों संबंधी संसदीय समिति की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, निर्माणाधीन NHPC परियोजनाओं को वन मंजूरी हासिल करने में औसतन 106 महीने यानी लगभग नौ साल लग रहे हैं। इससे परियोजनाओं की समयसीमा काफी बढ़ रही है।

समिति ने वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत स्टेज-II वन मंजूरी के लिए 100 प्रतिशत ग्राम सभा की सहमति की अनिवार्यता को देरी का प्रमुख कारण बताया है। समिति ने उत्तर सिक्किम की 520 मेगावाट की तीस्ता स्टेज-IV जलविद्युत परियोजना का उदाहरण दिया, जो कुछ ग्राम पंचायतों की सहमति लंबित होने के कारण अब भी रुकी हुई है।

स्थिति पर चिंता जताते हुए समिति ने सर्वसम्मत सहमति की मौजूदा अनिवार्यता को बदलकर 70-75 प्रतिशत योग्य बहुमत करने की सिफारिश की है। हालांकि, इसके साथ यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि स्थानीय समुदायों के अधिकारों और हितों की उचित सुरक्षा बनी रहे।

NHPC ने समिति को बताया कि हर ग्राम सभा से सर्वसम्मत मंजूरी हासिल करना अक्सर व्यावहारिक नहीं होता, खासकर तब जब बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं कई गांवों में फैली हों। कंपनी का कहना है कि योग्य बहुमत की सीमा सामुदायिक भागीदारी और परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन के बीच संतुलन कायम कर सकती है।

अपने प्रस्ताव के समर्थन में NHPC ने ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में अपनाए जाने वाले परामर्श मॉडल का हवाला दिया। इन देशों में हर मामले में सर्वसम्मति अनिवार्य किए बिना आदिवासी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। NHPC ने यह भी सुझाव दिया कि वन अधिकार अधिनियम के अनुपालन की प्रक्रिया अंतिम चरणों तक इंतजार करने के बजाय परियोजना की पूर्व-व्यवहार्यता के चरण में ही शुरू कर दी जानी चाहिए।

विद्युत मंत्रालय ने स्वीकार किया कि वन और भूमि मंजूरियां अब भी पनबिजली परियोजनाओं के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। मंत्रालय ने समिति को यह भी बताया कि अरुणाचल प्रदेश सरकार राज्य में स्थित परियोजनाओं से जुड़े मंजूरी संबंधी मुद्दों को हल करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है।

भारत में वर्तमान में लगभग 1,33,000 मेगावाट पनबिजली क्षमता की संभावना का अनुमान है, लेकिन अब तक केवल करीब 44,000 मेगावाट क्षमता ही विकसित की जा सकी है, जो कुल क्षमता का लगभग एक-तिहाई है। समिति ने कहा कि देश के दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पनबिजली परियोजनाओं का तेजी से क्रियान्वयन जरूरी है।

अपनी सिफारिशों में समिति ने विद्युत मंत्रालय से जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श करने को कहा है। इस विचार-विमर्श का उद्देश्य राष्ट्रीय महत्व की पनबिजली परियोजनाओं के लिए 70-75 प्रतिशत सहमति की सीमा लागू करने की व्यवहार्यता की जांच करना है।

समिति ने यह भी जोर दिया कि लंबे समय तक चलने वाली स्टेज-II वन मंजूरी प्रक्रिया में देरी से बचने के लिए वन अधिकार अधिनियम का अनुपालन परियोजना के जीवनचक्र में काफी पहले शुरू किया जाना चाहिए। इससे महत्वपूर्ण नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को समय पर पूरा करने में मदद मिलेगी और प्रभावित समुदायों के अधिकारों की भी रक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

By Rajeev Sharma

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