नई दिल्ली(राजीव शर्मा):जैसे-जैसे स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ रहा है, दिल्ली के सदर बाजार की हलचल फिर से तिरंगा के रंगों से भर गई है। दुकानों में अलग‑अलग साइज के राष्ट्रीय ध्वज, देशभक्ति बैज, कलाई रिबन और छोटे डैशबोर्ड फ्लैग्स सज चुके हैं, और 15 अगस्त से पहले ग्राहकों की भीड़ बड़ी संख्या में आती है।
लेकिन इस मौसमी भीड़ के पीछे एक ऐसा परिवार है जिसका राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ाव आज़ादी से भी पहले के वर्षों तक जाता है। यह विरासत अब्दुल रहमान से शुरू हुई, जिन्होंने आज़ादी से पहले तिरंगे बनाना शुरू किया। यह परंपरा उनके पुत्र अब्दुल गफ़्फ़ार ने आगे बढ़ाई और अब उनके पोते अब्दुल मलिक यह काम संभाल रहे हैं।
गफ़्फ़ार का 29 दिसंबर 2025 को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के दौरान वह परिचित नाम बन गए थे, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें ‘फ्लैग अंकल’ के रूप में संबोधित किया था। मलिक के लिए हालांकि उनके दादा का तिरंगे से जुड़ाव सार्वजनिक पहचान से ज्यादा दशकों के काम की परिणति थी।
परिवार का व्यापार उन दौरों में खास तौर पर बढ़ा जब देश में देशभक्ति की लहर तेज हुई। मलिक को 1962 के भारत‑चीन युद्ध का समय ऐसे मील के पत्थर के रूप में याद है। उस माहौल ने उनके पिता को पारिवारिक पेशा होने के साथ‑साथ तिरंगा बनाना एक बड़े प्रयोजन के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
इन दशकों में परिवार ने देश के कई निर्णायक आयोजनों को देखा — इमरजेंसी, कारगिल संघर्ष, अन्ना आंदोलन और बाद में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान। हर दौर में राष्ट्रीय ध्वज के प्रति रुचि फिर से जाग उठी।
गफ़्फ़ार के निधन के बाद ज़िम्मेदारी अब तीसरी पीढ़ी पर आ गई है। मलिक कहते हैं कि इस साल, जब देश स्वतंत्रता आंदोलन की 80वीं सालगिरह मना रहा है, उन्होंने लगभग 25 से 30 लाख तिरंगे सप्लाई किए।
सदर बाजार इस अवधि में खास तौर पर व्यस्त हो जाता है। बाजार के कई व्यापारी तिरंगे बनाते और वितरित करते हैं, साथ ही बैज, रिबन और वाहन‑डैशबोर्ड के लिए छोटे झंडों की मांग भी बढ़ जाती है। राजेश गुप्ता और इर्शाद खान जैसे व्यापारियों का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस से पहले के हफ्ते सिर्फ बिक्री बढ़ने का समय नहीं होते; उनके लिए यह शहर में दिखाई देने वाली जनभावनात्मक देशभक्ति से जुड़ा मौसम होता है।
परिवार की यात्रा यह भी दिखाती है कि राष्ट्रीय ध्वज पीढ़ियों के काम का केन्द्रीय प्रतीक कैसे बना रहा। स्वतंत्रता‑पूर्व बंगाल से लाई गयी खादी से लेकर आज लाखों झंडों की सप्लाई तक, यह व्यवसाय समय के साथ विकसित हुआ है।
तीन पीढ़ियों ने पारिवारिक धंधा आगे बढ़ाया है, पर उनका केंद्रीय प्रतीक — तिरंगा — कभी नहीं बदला।
