पेरिस (राजीव शर्मा): बढ़ती जीवन-यापन लागत, आवास के बढ़ते संकट और आर्थिक अवसरों के अभाव से उपजी निराशा ने फ्रांस, बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शनों को भड़का दिया है। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़पों ने पूरे यूरोप में बढ़ते जन-असंतोष को उजागर कर दिया है।
शनिवार को कई शहरों में अलग-अलग विरोध-प्रदर्शन हुए, जिनमें छात्र, कामकाजी लोग और अन्य नागरिक वित्तीय दबावों से राहत की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे। हालांकि कई रैलियां शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुईं, लेकिन बाद में कुछ जगहों पर हालात हिंसक हो गए, जहां लूटपाट, आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस कर्मियों के घायल होने की घटनाएं सामने आईं।
सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन फ्रांस में देखने को मिला, जहां गृह मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक देशभर में 5,50,000 से अधिक लोगों ने रैलियों में हिस्सा लिया। छात्रों के नेतृत्व में कई हफ्तों से चल रहे असंतोष के बाद यह उग्र रूप देखने को मिला, जब नकाबपोश उपद्रवियों के समूहों ने दुकानों, सरकारी इमारतों और पुलिस वाहनों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।
फ्रांसीसी प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने बताया कि लगभग 1,200 लोगों को हिरासत में लिया गया है और 150 पुलिस अधिकारी घायल हुए हैं। मध्य पेरिस में तैनात जवानों से मिलने पहुंचे प्रधानमंत्री ने हिंसा के स्तर को बेहद चिंताजनक करार देते हुए कहा कि इसके परिणाम और भी बदतर हो सकते थे।
पेरिस सहित मार्सिले, नीस, नांत, बोर्डो, लिल, टूलੂਜ਼ और स्ट्रासबर्ग जैसे कई अन्य शहरों से भी लूटपाट की खबरें आईं। पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोइरे ने कहा कि राजधानी की कई सड़कों को भारी नुकसान पहुंचा है।
लिमोजेस में उपद्रव के दौरान लगाई गई आग ने 140 साल से अधिक पुरानी ऐतिहासिक टाउन हॉल की इमारत को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया। मार्सिले और लिल में भी नगरपालिका की इमारतों में तोड़फोड़ की खबरें आईं, जबकि प्रदर्शनकारियों ने ल्योन के पर्यटन कार्यालय में आग लगा दी।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस विनाशकारी हिंसा की निंदा करते हुए चेतावनी दी कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें बख्शा नहीं जाएगा।
प्रदर्शन तेज होने पर बेल्जियम में पुलिसिया कार्रवाई
विश्वविद्यालय पंजीकरण शुल्क (रजिस्ट्रेशन फीस) को लेकर छात्रों के हफ्तों से जारी विरोध का सामना कर रहे ब्रुसेल्स में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच नई झड़पें हुईं, जहां भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और वॉटर कैनन (पानी की बौछारों) का सहारा लिया गया। अधिकारियों ने कुछ प्रदर्शनकारियों पर पुलिसकर्मियों पर पथराव करने और आगजनी करने का आरोप लगाया।
राजधानी के पूर्व में स्थित लीज शहर में भी हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस ने ऐसे ही कदम उठाए। हालांकि अधिकारियों ने रैलियों में शामिल लोगों की संख्या के आधिकारिक आंकड़े तुरंत जारी नहीं किए।
ये विरोध-प्रदर्शन शिक्षा के महंगे होने और परिवारों पर बढ़ते वित्तीय बोझ से जुड़ी व्यापक चिंताओं को दर्शाते हैं, जिससे पहले से ही आर्थिक दबाव झेल रही सरकारों पर अतिरिक्त वित्तीय सहायता देने की मांग तेज हो गई है।
पुर्तगाल में आवास संकट और कम वेतन ने भड़काया गुस्सा
लिस्बन में महंगे आवास, कम वेतन और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों के खिलाफ हजारों लोगों ने सड़कों पर मार्च निकाला।
पुर्तगाल के प्रमुख शहरों में आवास की समस्या बेहद गंभीर रूप ले चुकी है। वर्ष 2017 के बाद से मकानों की कीमतें दोगुनी से भी अधिक हो गई हैं, जबकि नए लीज अनुबंधों के लिए किराये में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिससे कई नागरिकों के लिए किफायती छत ढूंढना लगभग असंभव हो गया है।
इन प्रदर्शनों ने जनता की अपेक्षाओं और सरकार के रुख के बीच की खाई को भी उजागर कर दिया है। संसदीय कार्य मंत्री कार्लोस अब्रू अमोरिम ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि सरकार सड़क प्रदर्शनों के दबाव में आकर अपने फैसले नहीं बदलेगी। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक नेतृत्व पर आम लोगों की जमीनी समस्याओं को समझने में विफल रहने का आरोप लगाया।
इटली के शहरों में भी भड़की हिंसा
फ्रांस के बाहर सबसे गंभीर उपद्रव मिलान में देखने को मिला। युद्ध और बढ़ती महंगाई के विरोध में आयोजित एक शांतिपूर्ण मार्च उस समय हिंसक हो गया जब नकाबपोश तत्वों ने दंगा-रोधी पुलिस पर पत्थर व फुटपाथ की टाइलें फेंकनी शुरू कर दीं, बैरिकेड्स में आग लगा दी और शहर के केंद्र में संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया।
पियाजा डेल डुओमो और एक लक्जरी शॉपिंग आर्केड सहित संवेदनशील इलाकों से भीड़ को खदेड़ने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे और पानी की बौछारें कीं। इतालवी समाचार एजेंसी लाप्रेस (LaPresse) के अनुसार, कम से कम दो पुलिस अधिकारी घायल हुए हैं, जबकि करीब 50 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है, जिनमें से कई नाबालिग बताए जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि विरोध करने के लोकतांत्रिक अधिकार की आड़ में सार्वजनिक स्थानों को आग के हवाले करने या संपत्तियों को तबाह करने को जायज नहीं ठहराया जा सकता।
मिलान के मेयर ग्यूसेप साला ने माना कि प्रदर्शनकारियों की चिंताएं वाजिब हैं, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुरक्षा बलों पर हमले और शहर में तोड़फोड़ का किसी भी सूरत में बचाव नहीं किया जा सकता। इसके अलावा बोलोग्ना में भी रैलियों के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की खबरें आईं।
पूरे यूरोप में पनप रहा व्यापक असंतोष
यद्यपि बेल्जियम, इटली और पुर्तगाल में हुए प्रदर्शन फ्रांस जितने बड़े नहीं थे, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि एक साथ कई देशों में भड़का यह असंतोष पूरे महाद्वीप में फैल रही नाराजगी की एक व्यापक लहर का संकेत दे सकता है।
एचईसी पेरिस बिजनेस स्कूल में यूरोपीय संघ के कानून और नीति के प्रोफेसर अल्बर्टो अलेमानो ने अल जज़ीरा से बात करते हुए कहा कि फ्रांस मौजूदा आंदोलन के केंद्र में नजर आ रहा है, जबकि अन्य देशों में भी ऐसे ही लामबंदी के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में प्रदर्शनों का दायरा और बढ़ सकता है। ग्रीस, जर्मनी और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में भी विरोध के शुरुआती लक्षण उभरने लगे हैं।
अलेमानो ने स्पष्ट किया कि ये प्रदर्शन किसी एक केंद्रीकृत आंदोलन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह अलग-अलग तबकों का ऐसा साझा मंच है जिनकी समस्याएं एक जैसी हैं—जैसे कि बढ़ती जीवन-यापन लागत, शिक्षा का बजट और डिग्री पूरी होने के बाद रोजगार के अवसरों को लेकर अनिश्चितता।
यह अशांति ऐसे समय में सामने आई है जब यूरोप एक महत्वपूर्ण चुनावी दौर में प्रवेश करने जा रहा है। अगले 12 महीनों के दौरान स्पेन, फ्रांस, इटली और पोलैंड सहित कई देशों में आम चुनाव होने हैं।
आर्थिक दबावों के जन-विमर्श के केंद्र में आने के साथ ही यह विरोध प्रदर्शन राजनीतिक दलों और सरकारों के लिए एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन सकता है। यूरोपीय नेताओं के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे और अधिक हिंसा को रोकते हुए तथा निराश नागरिकों में विश्वास बहाल करते हुए उनकी बुनियादी समस्याओं का समाधान कैसे निकालते हैं।
