नई दिल्ली (राजीव शर्मा): दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के वार्षिक मानसून-पूर्व भवन निरीक्षण ने इस बात पर सवाल खड़े कर दिए हैं कि सुरक्षा के लिहाज से जोखिम पैदा करने वाले ढांचों से यह नागरिक निकाय कितनी मुस्तैदी से निपट रहा है। राजधानी भर में लगभग 30.7 लाख इमारतों की जांच करने के बावजूद एमसीडी ने इस साल केवल 62 इमारतों को ही खतरनाक श्रेणी में रखा।
ये आंकड़े इसलिए बेहद अहम हो जाते हैं क्योंकि दिल्ली में लगातार पुरानी और जर्जर इमारतों से जुड़े हादसे सामने आते रहते हैं। चिंता सिर्फ निरीक्षण के दौरान पहचानी गई इमारतों की संख्या को लेकर ही नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि किसी इमारत को असुरक्षित घोषित किए जाने के बाद उस पर क्या कार्रवाई होती है।
कई मामले पहचान और सुधारात्मक कार्रवाई के बीच के बड़े अंतर को उजागर करते हैं।
असुरक्षित घोषित इमारतें अब भी खड़ी हैं
ऐसा ही एक उदाहरण गफ्फार मार्केट की एक इमारत का है, जिसे आईआईटी रुड़की के आकलन के बाद 2021 में जर्जर घोषित कर दिया गया था। इस वर्गीकरण के बावजूद, इमारत के खिलाफ अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है। इस इलाके में हजारों दुकानें लगातार चल रही हैं, जिससे वहां काम करने वाले लोगों और आने वाले ग्राहकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
दूसरा मामला रोहिणी सेक्टर 15 के कृष्णा कुंज से सामने आया है। बी-ब्लॉक, पॉकेट बी-6 की बिल्डिंग नंबर 18 को कथित तौर पर करीब चार साल पहले जर्जर घोषित किया गया था। हालांकि, इसका स्थायी समाधान अभी तक अधर में लटका हुआ है।
इमारत के चारों ओर बांस की बल्लियां लगाई गई हैं और इसे डेंजर जोन बताने वाला चेतावनी बोर्ड लगाया गया है। लेकिन इन फौरी और कामचलाऊ उपायों से मूल ढांचागत जोखिम दूर नहीं हुआ है।
लिहाजा, इस स्थिति ने इमारत गिरने की सूरत में जवाबदेही को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
निगम का अपना दफ्तर भी सवालों के घेरे में
यह मसला सिर्फ निजी संपत्तियों तक ही सीमित नहीं है। पुरानी दिल्ली स्थित एमसीडी का एक जोनल कार्यालय भी अपनी खस्ताहाल स्थिति के चलते चर्चा में आ गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इमारत के कई हिस्से बदहाली का शिकार हैं और दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है। यह ढांचा भूमिगत मेट्रो कॉरिडोर के पास स्थित है और कथित तौर पर ट्रेन गुजरने के दौरान इसमें कंपन महसूस होता है।
इन तमाम चिंताओं के बावजूद जरूरी मरम्मत का काम अभी तक अटका हुआ है। एमसीडी की स्थायी समिति की बैठक के दौरान ‘आप’ पार्षद अरीबा खान ने हाल ही में इस इमारत की बदहाली का मुद्दा उठाया था।
इस परिसर में निगम के जोनल संपत्ति कर और शिक्षा विभाग के दफ्तर मौजूद हैं, जिसका मतलब है कि अधिकारियों के साथ-साथ आम जनता का भी यहां लगातार आना-जाना बना रहता है।
खतरनाक ढांचों की सूची में करोल बाग सबसे आगे
एमसीडी के मानसून-पूर्व निरीक्षण के आंकड़ों में जोनों के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
करोल बाग जोन में सबसे ज्यादा 19 इमारतों को खतरनाक श्रेणी में रखा गया है। इसके बाद पश्चिमी जोन में नौ, मध्य जोन में आठ, दक्षिणी जोन में चार और सिटी-सदर पहाड़गंज में पांच ऐसी इमारतें पाई गईं।
इसके विपरीत, शाहदरा उत्तर, शाहदरा दक्षिण और सिविल लाइंस जोन में इस पूरी कवायद के दौरान एक भी इमारत खतरनाक की श्रेणी में दर्ज नहीं की गई।
सर्वेक्षण के आंकड़ों ने अनुवर्ती कार्रवाई पर उठाए सवाल
निरीक्षण की गई इमारतों और खतरनाक घोषित इमारतों की संख्या के बीच का यह भारी अंतर अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सर्वे बेअसर था। हालांकि, इन आंकड़ों ने निरीक्षण के तौर-तरीकों और इस बात पर सवाल जरूर खड़े किए हैं कि क्या संभावित जोखिम वाले ढांचों की समय रहते सही पहचान की जा रही है।
इससे भी अहम बात यह है कि जिन मामलों में इमारतों को पहले ही जर्जर घोषित किया जा चुका है और वे अब भी इस्तेमाल में हैं, वे निगम के सामने दूसरी बड़ी चुनौती पेश करते हैं: चेतावनियों के बाद ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करना।
दिल्लीवासियों के लिए यह चिंता सिर्फ कागजी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। राजधानी में इमारतों के ढहने की घटनाएं लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं, ऐसे में एमसीडी की इस कवायद की सार्थकता अंततः इस बात से नहीं आंकी जाएगी कि उसने कितने ढांचों का सर्वे किया, बल्कि इससे तय होगी कि खतरनाक इमारतों से जान का खतरा बनने से पहले उनकी मरम्मत कराई गई, उन्हें खाली कराया गया या सुरक्षित बनाया गया।
