लद्दाख गोलीकांड को एक साल, सोनम वांगचुक ने फिर उठाई जांच रिपोर्ट और जवाबदेही की मांग

नई दिल्ली(राजीव शर्मा):: लेह में हुए प्रदर्शनों के दौरान चार लोगों की मौत के एक साल बाद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 24 सितंबर 2025 की हिंसा पर न्यायिक जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक करने की मांग दोहराई है। उन्होंने पीड़ित परिवारों के लिए अधिक मुआवजे और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की समीक्षा की भी मांग की।

घटना की पहली बरसी पर वांगचुक ने कहा कि एक साल बीत जाने के बावजूद अपने लोगों को खोने वाले परिवारों के सवालों का जवाब नहीं मिला है। उन्होंने सवाल उठाया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. एस. चौहान की अध्यक्षता वाले न्यायिक आयोग की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई है।

केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2025 में लेह की कानून-व्यवस्था की स्थिति, पुलिस कार्रवाई और चार लोगों की मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच के लिए न्यायिक जांच के आदेश दिए थे। आयोग ने उसी महीने बाद में अपनी कार्यवाही शुरू की थी।

वांगचुक ने कहा कि जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि गोलीबारी की नौबत क्यों आई, क्या वास्तविक गोलियां चलाने से पहले भीड़ को नियंत्रित करने के सभी उचित उपाय आजमाए गए थे और क्या इन मौतों को रोका जा सकता था।

उन्होंने कहा कि इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप के बजाय न्यायिक आयोग की रिपोर्ट के माध्यम से मिलना चाहिए। वांगचुक ने कहा कि यदि जांच में किसी तरह की गलती या अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए, चाहे उनका पद या स्थिति कुछ भी रही हो।

मुआवजे पर सवाल
वांगचुक ने पिछले वर्ष की हिंसा से प्रभावित लोगों के लिए लद्दाख प्रशासन द्वारा घोषित मुआवजा पैकेज पर भी सवाल उठाए।

प्रशासन ने कुल 1.52 करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी है। मारे गए चारों लोगों के परिवारों को 15-15 लाख रुपये, गंभीर रूप से घायल 24 लोगों में से प्रत्येक को 3 लाख रुपये और मामूली रूप से घायल 20 लोगों में से प्रत्येक को 1 लाख रुपये देने की मंजूरी दी गई है।

वांगचुक ने कहा कि कोई भी आर्थिक सहायता किसी की जान की भरपाई नहीं कर सकती। हालांकि, उनका तर्क था कि परिवारों को दी जाने वाली राशि बढ़ाकर अधिक सम्मानजनक स्तर तक की जानी चाहिए।

उन्होंने मुआवजा दिए जाने के समय पर भी सवाल उठाया और केंद्र शासित प्रदेश में सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा उत्सवों पर होने वाले सरकारी खर्च से इसकी तुलना की।

एनएसए के तहत हिरासत का मुद्दा
कार्यकर्ता ने सितंबर 2025 के उपद्रव के बाद अपनी हिरासत पर भी सवाल उठाए। उन्हें पिछले वर्ष 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था और लद्दाख से करीब 2,000 किलोमीटर दूर जोधपुर केंद्रीय जेल भेजा गया था। उन्होंने कहा कि वह लगभग छह महीने तक हिरासत में रहे।

वांगचुक ने अपनी हिरासत के आधार पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस पूरे घटनाक्रम ने निवारक हिरासत संबंधी कानूनों के इस्तेमाल को लेकर व्यापक चिंताएं पैदा की हैं। उनका तर्क था कि असाधारण शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़े फैसले लेने वाले अधिकारी अपने पद से हटने के बाद भी जवाबदेही से मुक्त नहीं होने चाहिए।

प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों की समीक्षा की मांग
वांगचुक ने पिछले वर्ष के प्रदर्शनों से संबंधित आपराधिक कार्यवाही की ओर भी ध्यान दिलाया।

उनके बयान के अनुसार, 87 लोगों को आरोपी के तौर पर चिन्हित किया गया था और 81 लोगों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई थी। इसके बाद लद्दाख प्रशासन ने 20 लोगों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने को मंजूरी दी है।

वांगचुक ने मामलों की वापसी का स्वागत किया, लेकिन शेष मामलों की स्थिति पर सवाल उठाया। उन्होंने विशेष रूप से उन मामलों की समीक्षा की मांग की, जिनमें आरोपी लोग हिंसा में सीधे तौर पर शामिल नहीं रहे होंगे।

24 सितंबर 2025 की घटना लद्दाख के लिए राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा सहित विभिन्न मांगों को लेकर लेह में हुए प्रदर्शनों के दौरान हुई थी। हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और दर्जनों लोग घायल हुए थे। इसके बाद शुरू की गई न्यायिक जांच को उपद्रव की परिस्थितियों और पुलिस की कार्रवाई की जांच का जिम्मा सौंपा गया था।

घटना की पहली बरसी के साथ ही वांगचुक के ताजा बयान ने सितंबर 2025 की घटनाओं को लेकर लंबित जांच रिपोर्ट, मुआवजे और आपराधिक मामलों की कार्यवाही को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।

By Rajeev Sharma

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *