नई दिल्ली (राजीव शर्मा): भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration – CoA) द्वारा जारी एक नए फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। भारत ने दोहराया कि वह इस मध्यस्थता निकाय को कानूनी रूप से वैध या देश से जुड़े मामलों पर फैसला करने के लिए सक्षम नहीं मानता है।
सरकार ने कहा कि इस पैनल का गठन इस तरह से किया गया था, जो भारत के आकलन के अनुसार, सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। इसलिए नई दिल्ली ने शुरुआत से ही यह रुख बनाए रखा है कि इस निकाय का कोई वैध अधिकार क्षेत्र (अधिकारिता) नहीं है और भारत ने इसकी कार्यवाही में भाग लेने से इनकार कर दिया है।
अंतरिम उपायों और संधि की स्थिति से संबंधित इस ताजा फैसले को भारत ने खारिज कर दिया है। सरकार ने कहा कि पैनल द्वारा पहले जारी किए गए बयानों के बावजूद उसका रुख अपरिवर्तित बना हुआ है।
भारत ने इस बात पर भी जोर दिया कि उसकी सरकार द्वारा अपनी संप्रभु सत्ता का प्रयोग करते हुए लिए गए फैसलों को ऐसे किसी मध्यस्थता तंत्र के अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं लाया जा सकता जिसे वह मान्यता नहीं देता। सरकार ने आगे कहा कि पैनल का वर्तमान या भविष्य का कोई भी फैसला भारत द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं के प्रति देश के दृष्टिकोण को नहीं बदलेगा।
सरकार ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित (abeyance) रखने का उसका फैसला प्रभावी बना हुआ है।
भारत का यह ताजा बयान संधि से जुड़ी समानांतर विवाद-समाधान प्रक्रिया, विशेष रूप से मध्यस्थता अदालत की वैधता और अधिकार क्षेत्र पर उसके लगातार जारी विरोध को रेखांकित करता है।
