नई दिल्ली(राजीव शर्मा): प्रभाव आकलन भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केन्द्र (इन-स्पेस) द्वारा किया गया है। प्रभाव आकलन पर प्रारंभिक टिप्पणी अनुलग्नक-I के रूप में संलग्न है।
वर्ष 2026 में कुल 187 मिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की जानकारी मिली है। अब तक इन-स्पेस द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) को विभिन्न अंतरिक्ष कार्यों के लिए कुल 108 आधिकारिक अनुमतियां प्रदान की जा चुकी हैं। इनमें उपग्रह/पेलोड की स्थापना एवं संचालन, अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों का प्रक्षेपण आदि शामिल हैं।
इन-स्पेस द्वारा जारी “अंतरिक्ष गतिविधियों की मंजूरी (एनजीपी) के संबंध में भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 के कार्यान्वयन के लिए मानदंड, दिशानिर्देश एवं प्रक्रियाओं” के अंतर्गत अनुमति के लिए प्राप्त आवेदनों का मूल्यांकन इस दृष्टि से किया जाता है कि निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों की अनुमति देते समय रणनीतिक, सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हितों सहित अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की रक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त, इन-स्पेस हितधारकों के परामर्श से “भारतीय संस्थाओं द्वारा भारत में संचालित अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए सुरक्षा एवं संरक्षा दिशानिर्देश” तैयार करने पर भी कार्य कर रहा है।
सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप्स को सहयोग देने के लिए विभिन्न पहल और योजनाएं शुरू की हैं। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए निम्नलिखित पहल और नीतियां लागू की गई हैं:
भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 लागू की गई है, जिसमें सभी हितधारकों की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई हैं।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति उदार बनाई गई है।
इन-स्पेस से अनुमति प्राप्त करने के लिए मानदंड, दिशानिर्देश एवं प्रक्रियाएं लागू की गई हैं।
इसरो की सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एनजीई के लिए रियायती मूल्य नीति लागू की गई है।
1,000 करोड़ रुपये के वेंचर कैपिटल फंड की स्थापना की गई है।
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास और उसके व्यावसायीकरण के लिए 500 करोड़ रुपये के प्रौद्योगिकी अपनाओ कोष की स्थापना की गई है।
विचारों को उत्पाद में विकसित करने के लिए इन-स्पेस सीड फंड योजना शुरू की गई है।
निजी क्षेत्र को इसरो की सुविधाओं तक पहुंच तथा मार्गदर्शन (मेंटरशिप) उपलब्ध कराया जा रहा है।
कौशल संबंधी आवश्यकताओं की कमी को दूर करने के लिए स्किल पहल शुरू की गई है।
अंतरिक्ष प्रणालियों के परीक्षण और सिमुलेशन की सुविधाएं किफायती लागत पर उपलब्ध कराने के लिए एक तकनीकी केन्द्र की स्थापना की गई है।
इसरो से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सक्षम बनाया गया है।
पीओईएम प्लेटफॉर्म के माध्यम से अंतरिक्ष उपयोगिता का परीक्षण करने का अवसर प्रदान किया जा रहा है।
स्पेस एडॉप्शन अवेयरनेस वर्कशॉप (एसएएडब्ल्यू), इंडस्ट्री मीट्स तथा अन्य प्रचारात्मक आयोजनों के माध्यम से व्यावसायिक अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इसके अलावा, 17 स्टार्ट-अप्स को अंतरिक्ष से जुड़ी अलग-अलग गतिविधियां करने की मंज़ूरी दी गई है।
स्पेस टेक्नोलॉजी के कमर्शियल इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए, भारत सरकार ने ये योजनाएं/पहल शुरू करने की घोषणा की है:
अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति लागू की गई है।
गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) को इसरो की सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करने के लिए रियायती मूल्य निर्धारण नीति लागू की गई है।
अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप्स को सहयोग देने के लिए 1,000 करोड़ रुपये के वेंचर कैपिटल फंड की स्थापना की गई है।
स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के विकास, प्रदर्शन और व्यावसायीकरण में तेजी लाने के लिए 500 करोड़ रुपये के प्रौद्योगिकी अपनाओ कोष (टीएएफ) की शुरुआत की गई है।
निजी क्षेत्र के विकास को समर्थन देने के लिए इसरो के अवसंरचना, तकनीकी विशेषज्ञता और मार्गदर्शन तक पहुंच उपलब्ध कराई जा रही है।
अंतरिक्ष क्षेत्र की बदलती कार्यबल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कौशल विकास संबंधी पहलें शुरू की गई हैं।
अंतरिक्ष प्रणालियों के किफायती परीक्षण, सत्यापन और सिमुलेशन सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एक तकनीकी केन्द्र की स्थापना की गई है।
ii. व्यावसायीकरण को बढ़ावा देने के लिए इसरो द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों के उद्योगों को हस्तांतरण की व्यवस्था की गई है।
पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (पीओईएम) प्लेटफॉर्म के माध्यम से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के सत्यापन के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
स्वदेशी उपग्रह प्लेटफॉर्म क्षमताओं के विकास तथा उपग्रह निर्माण में तेजी लाने के लिए “सैटेलाइट बस ऐज़ अ सर्विस (एसबीएएएस) ” पहल शुरू की गई है।
घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ बनाने, निवेश आकर्षित करने तथा एकीकृत अंतरिक्ष औद्योगिक इकोसिस्टम के विकास के लिए राज्य सरकारों को समर्पित अंतरिक्ष विनिर्माण क्लस्टरों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के उदारीकरण के माध्यम से कई सक्रिय कदम उठाए हैं, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। इस दिशा में उठाए गए विभिन्न कदम निम्नलिखित हैं:
नीतिगत एवं नियामक सुधार:
भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 का कार्यान्वयन.
उदारीकृत एफडीआई नीति और अनुकूल नियामकों, दिशानिर्देशों का विकास।
बुनियादी ढांचा विकास:
गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) को पहुंच प्रदान करते हुए इसरो की सुविधाओं का विस्तार।
साझा अवसंरचना सहायता के साथ इन-स्पेस तकनीकी केन्द्र तथा अंतरिक्ष विनिर्माण क्लस्टरों की स्थापना।
कौशल विकास:
उद्योगोन्मुख अंतरिक्ष पाठ्यक्रम, विद्यार्थियों के लिए इमर्शन कार्यक्रम तथा क्षमता निर्माण संबंधी पहलें।
अंतरिक्ष क्षेत्र के प्रत्येक प्रमुख पहलू को शामिल करते हुए 14 अल्पकालिक कौशल विकास पाठ्यक्रमों का डिजाइन और विकास।
पूंजी तक पहुंच:
1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड।
प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रौद्योगिकी अपनाओ कोष।
स्टार्टअप्स के लिए वित्तपोषण तथा अनुसंधान एवं विकास सहायता को प्रोत्साहन।
प्रौद्योगिकी एवं क्षमता विकास:
एसएसएलवी सहित इसरो की प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण को बढ़ावा।
स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार को प्रोत्साहन।
मांग सृजन :
पृथ्वी अवलोकन के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी तथा प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट कार्यक्रम।
विभिन्न सरकारी क्षेत्रों में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को अपनाने को बढ़ावा देना।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं वैश्विक बाजार तक पहुंच:
द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से अग्रणी अंतरिक्ष देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को सुदृढ़ बनाना।
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष आयोजनों, व्यावसायिक मंचों तथा बिजनेस-टू-बिजनेस सहभागिताओं में भागीदारी को समर्थन देकर वैश्विक बाजार तक पहुंच को सुगम बनाना।
निर्यात, प्रौद्योगिकी साझेदारी तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए उभरते हुए अंतरिक्ष बाजारों के साथ सहयोग का विस्तार करना।
यह जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
अनुलग्नक – I
परिणाम
परिपक्व होती निजी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था
जून 2020 में किए गए सुधारों के तहत अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने के छह वर्ष बाद इसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। सक्रिय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या वर्ष 2014 में केवल 1 से बढ़कर आज 400 से अधिक हो गई है। निजी निवेश 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुका है और भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने प्रक्षेपण तथा कक्षा (ऑर्बिटल) संचालन क्षमता का सफल प्रदर्शन किया है। दो कंपनियों ने उप-कक्षीय (सब-ऑर्बिटल) प्रक्षेपण यान का सफल प्रक्षेपण किया है (नवम्बर 2022 और मई 2024 में)। एनजीई ने 30 से अधिक उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया है तथा पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (पीओईएम) जैसे प्लेटफॉर्मों के माध्यम से लगभग 45 पेलोड अंतरिक्ष में संचालित किए जा रहे हैं।
अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था: निवेश में वृद्धि, निवेशकों का व्यापक आधार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
निजी पूंजी में न केवल उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, बल्कि निवेशकों का आधार भी व्यापक हुआ है। संचयी वित्तपोषण वर्ष 2021-22 में 100.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर गया, वर्ष 2023-24 में बढ़कर 348.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया और 31 मार्च 2026 तक यह 618.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। साथ ही, निवेश का स्वरूप शुरुआती चरण के सीड निवेश से आगे बढ़कर विकास चरण की ओर स्थानांतरित हुआ है।
भारत के अंतरिक्ष इकोसिस्टम को गति देने वाले निवेशकों का आधार अब सम्पन्न निवेशकों तक सीमित नहीं रहा है। अब संप्रभु संपदा कोष, वैश्विक परिसंपत्ति प्रबंधक और रणनीतिक कॉर्पोरेट निवेशक भी निवेशकों की सूची में प्रमुख रूप से शामिल हैं। इस परिपक्व होते निवेश परिदृश्य के परिणामस्वरूप स्काईरूट एयरोस्पेस, जीआईसी और ब्लैकरॉक के निवेश सहयोग के साथ अंतरिक्ष क्षेत्र की पहली यूनिकॉर्न कंपनी बनी। वहीं, दिगंतारा ने जापान की एसबीआई इन्वेस्टमेंट की भागीदारी के साथ 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश हासिल किया, जबकि पिक्सेल को वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनी अल्फाबेट का समर्थन प्राप्त हुआ।
यह गति वर्ष 2026 में और तेज हुई। अग्निकुल कॉसमॉस ने इक्विटी निवेश के रूप में 2.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने के साथ-साथ तमिलनाडु सरकार से ऐतिहासिक 25 करोड़ रुपये का निवेश प्राप्त किया। गैलेक्सआई ने वर्ष की शुरुआत में कई निवेश चरणों के माध्यम से 11 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि जुटाई, जबकि ध्रुव स्पेस ने मई में 105 करोड़ रुपये (12.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का निवेश प्राप्त कर अपनी उपग्रह समूह क्षमताओं के तीव्र विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। हालांकि, ये चर्चित सफलता की कहानियां अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती व्यावसायिक संभावनाओं को दर्शाती हैं, लेकिन वे देश के कहीं अधिक व्यापक, जीवंत और तेजी से विकसित हो रहे अंतरिक्ष इकोसिस्टम की केवल एक छोटी-सी झलक भर हैं।
निजी अंतरिक्ष मिशनों का एक वर्ष: देश और विदेश में सहयोग तथा बढ़ता विश्वास
पिछले एक वर्ष के दौरान भारतीय कंपनियों ने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता का प्रभावी प्रदर्शन किया है और अनेक अवसरों पर अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ मिलकर सफल मिशन संचालित किए हैं। जनवरी 2025 में पिक्सेल, दिगांतारा और एक्सडीलिंक्स स्पेसलैब्स ने एक साथ सफलतापूर्वक कक्षा में प्रवेश किया। इसके बाद अगस्त 2025 में पिक्सेल ने फाल्कन-9 के माध्यम से तीन और उपग्रह प्रक्षेपित कर अपने छह-उपग्रहों वाले फायरफ्लाई उपग्रह समूह के प्रथम चरण को पूरा किया, जो वर्तमान में सेवा में उपलब्ध सर्वाधिक उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला वाणिज्यिक हाइपरस्पेक्ट्रल प्रणाली है। ध्रुव स्पेस ने अपने थायबोल्ट-3 और लीप-1 मिशनों का सफल संचालन किया तथा एमओआई-1 और लाचित जैसे सहयोगात्मक मिशनों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अतिरिक्त बेलाट्रिक्स, गैलेक्सआई, ग्रहा स्पेस, हेक्स-20, टेकमी2स्पेस, ऑर्बिटएड सहित अनेक अन्य कंपनियों ने भी निजी क्षेत्र की ऑर्बिटल क्षमताओं का सफल प्रदर्शन किया। प्रक्षेपण यान और प्रणोदन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्निकुल कॉसमॉस ने अपने 3डी-प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण किया, जबकि स्काईरूट एयरोस्पेस ने इसरो की एक सुविधा में अपने विक्रम रॉकेट के लिए ठोस ईंधन मोटर का सफल परीक्षण किया।
पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। इसने स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों को अंतरिक्ष में अपने पेलोड और प्रौद्योगिकियों के सत्यापन के लिए एक अत्यधिक सुलभ और कम लागत वाला मंच उपलब्ध कराया है। पीओईएम-4 मॉड्यूल में इसरो तथा शैक्षणिक संस्थानों के प्रयोगों के साथ-साथ गैलेक्सआई, बेलाट्रिक्स, टेकमी2स्पेस, पियरसाइट स्पेस, मनस्तु स्पेस और एनस्पेस टेक के पेलोड भी शामिल थे।
भारतीय अंतरिक्ष उद्योग की व्यावसायिक पहुंच भी लगातार बढ़ रही है। दिगंतारा अमेरिका और यूरोप में अपने कार्यालय स्थापित कर रही है तथा सिंगापुर और यूनाइटेड किंगडम की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ कार्य कर रही है। वहीं पिक्सेल विभिन्न महाद्वीपों के ग्राहकों को हाइपरस्पेक्ट्रल डेटा उपलब्ध करा रही है। इन-स्पेस ने 45 से अधिक देशों के साथ कार्य संबंध स्थापित किए हैं और विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ तीन सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। देश में, इन-स्पेस की अर्थ ऑब्जर्वेशन–पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (ईओ-पीपीपी) पहल के तहत पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, सैटश्योर और पियरसाइट स्पेस ने एलाइड ऑर्बिट्स के रूप में साझेदारी की है। इस साझेदारी के तहत लगभग 1,200 करोड़ रुपये के निजी निवेश से पांच वर्षों में 12 बहु-मोडल उपग्रहों वाला भारत का पहला निजी स्वामित्व वाला पृथ्वी अवलोकन उपग्रह समूह विकसित किया जाएगा, जो देश को उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला कानून के अधीन डेटा उपलब्ध कराएगा।
