नई दिल्ली(राजीव श्रम): नई दिल्ली में आईआईसीए के नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन रिस्पॉन्सिबल बिज़नेस कंडक्ट (एनसीआरबीसी) 2026 के चौथे संस्करण का आयोजन किया गया। “विकसित भारत के लिए ईएसजी-आधारित बदलाव” (विक्सिट भारत के लिए ईएसजी के नेतृत्व वाला परिवर्तन) विषय वाले इस दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ अरेयर्स (आईआईसीए) के स्कूल ऑफ बिग एनवायरनमेंट (एसबीई) ने किया है। आईआईसीए, भारत सरकार के कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी संस्थान है।
नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (एनएफआरए) के अध्यश्र श्री नितिन गुप्ता ने अपने विशेष संबोधन में कहा कि ज़िम्मेदार कारोबार व्यवहार ‘विकसित भारत’ के विज़न और प्रतिस्पर्धी कंपनियों, भरोसेमंद बाज़ारों, समावेशी विकास और पर्यावरण की स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है।
श्री नितिन गुप्ता ने कहा कि भारत ने स्थिरता से जुड़ी जानकारी को मज़बूत करने में काफ़ी प्रगति की है और अब उसे इसकी गुणवत्ता, विश्वसनीयता और निर्णय लेने में इसकी उपयोगिता को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि कि स्थिरता से जुड़ी जानकारी सुसंगत, तुलना करने लायक, साक्ष्यों पर आधारित और पुष्टि करने योग्य होनी चाहिए तथा इसे मज़बूत तरीकों, विश्वसनीय स्रोत प्रणाली और प्रभावकारी आंतरिक नियंत्रण का समर्थन मिलना चाहिए।
एनएफआरए के अध्यक्ष श्री नितिन गुप्ता ने विश्वसनीय स्थिरता रिपोर्टिंग के बढ़ते महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि स्थिरता से जुड़ी जानकारी को भी उसी अनुशासन और बारीकी से जांचा जाना चाहिए जैसा कि फाइनेंशियल रिपोर्टिंग और ऑडिट में होता है। उन्होंने कहा कि दस्तावेजीकरण, पता लगाने की क्षमता, मिलान, नियंत्रण स्वामित्व, साक्ष्यों को संभालकर रखना, पेशेवर संदेह और स्वतंत्र जांच के सिद्धांत स्थिरता से जुड़ी जानकारी की विश्वसनीयता को पुख्ता करने के लिए उतने ही आवश्यक हैं।
श्री नितिन गुप्ता ने प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने के साथ संस्थागत क्षमताओं को मज़बूत करते हुए- विशेषकर मूल्य शृंखला और एमएसएमई के बीच-स्थिरता रिपोर्टिंग के लिए एक उचित और व्यावहारिक तरीका अपनाने की ज़रूरत पर भी बल दिया।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉर्पोरेट अफेयर्स (आईआईसीए) के महानिदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि वर्ष 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के भारत के लक्ष्य के लिए ज़रूरी है कि पर्यावरण, सामाजिक और गवर्नेंस (ईएसजी) के सिद्धांत सिर्फ़ नियमों का पालन करने तक सीमित न रहें, बल्कि देश के आर्थिक विकास मॉडल का अहम हिस्सा बनें।
श्री सिंह ने कहा कि ज़िम्मेदार बिज़नेस व्यवहार भारत की सभ्यतागत सोच में गहराई से बसा है और प्रगतिशील नीति तथा नियामक सुधारों के माध्यम से विकसित हुआ है। देश के ज़िम्मेदार बिज़नेस फ़्रेमवर्क के विकास का उल्लेख करते हुए उन्होंने 2009 में जारी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी पर स्वैच्छिक गाइडलाइंस से लेकर 2021 में अनिवार्य बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (बीआरएसआर) प्रारूप को लागू करने तक की यात्रा की जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 166 (2) ने वैश्विक स्तर पर पहचान मिलने से बहुत पहले ही भारतीय कॉर्पोरेट कानून में ‘हितधारक की प्राथमिकता’ के सिद्धांत को शामिल कर लिया था। यह कॉर्पोरेट शासन के साथ दीर्घकालिकता को जोड़ने के प्रति भारत की शुरुआती प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
भारत में दीर्घकालिकता के बदलते परिदृश्य को “ईएसजी 1.0” से “ईएसजी 2.0” की ओर बदलाव बताते हुए श्री सिंह ने कहा कि ईएसजी अब केवल नियमों के पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लंबे समय में कंपनी की साख बढ़ाने, जोखिमों को बेहतर ढंग से संभालने और बिज़नेस को मज़बूत बनाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।
उन्होंने कहा कि इस बदलाव के लिए मज़बूत कानूनी, शासन और जवाबदेही वाले सिस्टम की ज़रूरत है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दीर्घकालिकता से जुड़े वादे भरोसेमंद हों, लागू किए जा सकें और भरोसे की ज़िम्मेदारियों के अनुरूप हों। भारत की ईएसजी यात्रा के अगले चरण की प्राथमिकताओं का उल्लेख करते हुए श्री सिंह ने बोर्ड-स्तर पर निर्णय लेते समय दीर्घकालिकता से जुड़ी बातों को शामिल करने; ‘ग्रीनवॉशिंग’ के जोखिमों से निपटने के लिए दीर्घकालिक डेटा की पुष्टि करने वाले कानूनी और नियामक प्रणाली को मज़बूत करने; और विभिन्न मूल्य शृंखलाओं में दीर्घकालिक डेटा की गुणवत्ता, पता लगाने की क्षमता और पारदर्शिता को बेहतर बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई टेक्नोलॉजी का उपयोग करने की ज़रूरत पर बल दिया।
एक विशेष संबोधन में, यूनिसेफ इंडिया के उप-प्रतिनिधि (कार्यक्रम) श्री जेस्पर मोलर ने कहा कि बच्चों के अधिकारों को केवल दान-पुण्य का मामला न मानकर मुख्य बिज़नेस रणनीति में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारत में 400 मिलियन से अधिक बच्चे हैं, जो देश के भविष्य के कार्यबल और उपभोक्ता हैं। उन्होंने बताया कि मातृत्व अवकाश, कार्यस्थल पर बच्चों की देखभाल की सुविधा और ज़िम्मेदार आपूर्ति शृंखला जैसे निर्णय बच्चों की भलाई पर सीधा असर डालते हैं। उन्होंने असम के एक चाय बागान में काम करने वाली एक युवा मां का उदाहरण दिया, जिसके नियोक्ता की परिवार-अनुकूल नीतियों से न केवल उसके बच्चे की देखभाल बेहतर हुई, बल्कि कंपनी में कर्मचारियों के बने रहने की दर में भी सुधार हुआ।
एसीसीए (एसोसिएशन ऑफ़ चार्टर्ड सर्टिफाइड अकाउंटेंट्स) की प्रमुख कार्यकारी सुश्री हेलेन ब्रांड ने वर्चुअल रूप से चर्चा करते हुए दीर्घकालिक व्यापार व्यवस्था पर आईआईसीए के साथ एसीसीए की साझेदारी को फिर से दोहराया। उन्होंने भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ते वैश्विक प्रभाव को देखते हुए इसे अत्यंत तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की संज्ञा दी। एसीसीए की ‘ग्लोबल टैलेंट ट्रेंड्स रिपोर्ट 2026’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया भर में ज़्यादातर वित्त पेशेवर अब ऐसा करियर चाहते हैं जिससे समाज पर सकारात्मक असर पड़े। उन्होंने कहा कि सामाजिक व मानवाधिकार के मुद्दों पर नियोक्ता की प्रतिष्ठा एक अहम कारक बन गई है जिसके आधार पर पेशेवर कार्य करने का स्थल चुनते हैं।
उद्घाटन सत्र के समापन भाषण में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉर्पोरेट अफेयर्स के स्कूल ऑफ़ बिज़नेस एनवायरनमेंट की प्रमुख प्रोफ़ेसर गरिमा दधीच ने ज़िम्मेदार बिज़नेस व्यवहार को ‘विकसित भारत’ के लिए ज़रूरी बताया। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिकता को सिर्फ़ नियमों का पालन करने की प्रक्रिया के तौर पर नहीं, बल्कि विकास की नींव के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने सम्मेलन के लिए तीन मुख्य सिद्धांतों- पीढ़ीगत उत्तरदायित्व; ऋग्वेद के सामूहिक कार्य के आह्वान- संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् में सांस्कृतिक जुड़ाव; और भारत के जी20 विज़न- “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” के साथ सामंजस्य का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष की चर्चाएं केंद्रीय बजट 2026–27 पर आधारित हैं, जिसमें हरित विकास, जलवायु परिवर्तन और दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे को देश की वित्तीय प्राथमिकताओं में सबसे प्रमुख जगह दी गई है। वित्त कार्यों की संसदीय स्थायी समिति ने भी मज़बूत ईएसजी प्रारूप, बेहतर डिस्क्लोज़र और असर के ज़्यादा कड़े आकलन की मांग की है।उद्घाटन सत्र के बाद प्रोफ़ेसर गरिमा दधीच के संचालन में “ईएसजी, शासन और बोर्ड-लेवल डिस्क्लोज़र” पर एक उच्चस्तरीय पैनल चर्चा हुई। इसमें नियामक और उद्योग प्रमुखों ने इस बात पर चर्चा की कि कॉर्पोरेट शासन में ज़िम्मेदार कारोबार के तौर-तरीकों को कैसे शामिल किया जा सकता है। सेबी (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) के पूर्णकालिक सदस्य श्री अमरजीत सिंह ने वैश्विक मानकों को अपनाने में जल्दबाज़ी न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय प्रारूप के साथ शीघ्रता से जुड़ने के बजाय, अपने विकास के स्तर के हिसाब से अपना मार्ग स्वयं तय करना चाहिए।
ओएनजीसी (ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन) के अध्यक्ष श्री अरुण कुमार सिंह ने कहा कि सही स्तर पर क्षमता के मुताबिक कार्य करना कहीं बेहतर है। उन्होंने रेगुलेटर से अपील की कि वे कंपनियों को उनकी महत्वाकांक्षा और मंशा के लिए पुरस्कृत करें न कि आशा के अनुरूप कार्य न कर पाने पर उन्हें सज़ा दें। शासन में इरादा और भरोसा अहम भूमिका निभाते हैं।
सीईईडब्ल्यू (काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अरुणाभ घोष ने कहा कि ईएसजी के सिद्धांत को अक्सर एक अवसर की बजाय मुश्किल कार्य माना जाता है। उन्होंने बताया कि भारत की हरित अर्थव्यवस्था में अनुमानित रूप से 4 ट्रिलियन डॉलर के निवेश के अवसर हैं।
एनएसई के वरिष्ठ सलाहकार श्री शैलेश पाठक ने कहा कि पूंजी “वहां जाती है जहां उसे अवसर दिखता है, लेकिन वहां रुकती है जहां उसे भरोसा होता है।” उन्होंने सोशल स्टॉक एक्सचेंज को पूंजी और सोशल एंटरप्राइज़ के बीच एक पारदर्शी सेतु बताया।
केआईएल (किर्लोस्कर इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड) के प्रबंध निदेशक श्री जॉर्ज वर्गीज़ ने बताया कि कैसे उत्सर्जन के कड़े नियम, जिन्हें शुरू में लागत का बोझ माना गया था, ने आखिरकार उनकी कंपनी के उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार खोल दिए।
आईसीएआई (इंस्टीट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ़ इंडिया) के सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड्स बोर्ड (एसआरएसबी) के चेयरमैन सीए प्रमोद जैन ने कहा कि भारत उन पहले देशों में से एक बन गया है जिन्होंने ईएसजी भरोसे को स्वैच्छिक के बजाय अनिवार्य बना दिया है, जिससे बोर्ड डिस्क्लोज़र को भी वित्तीय स्टेटमेंट जैसी ही विश्वसनीयता मिली है। इस पैनल का संचालन आईआईसीए में स्कूल ऑफ़ बिज़नेस एनवायरनमेंट की प्रमुख प्रोफ़ेसर गरिमा दधीच ने किया।
350 से ज़्यादा वरिष्ठ कॉर्पोरेट प्रमुख, ईएसजी पेशेवर, नीति-निर्माता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की बड़ी भागीदारी और जाने-माने वक्ताओं की ज्ञानवर्धक चर्चाओं के साथ, एनसीआरबीसी 2026 के पहले दिन ने आगामी सत्रों के लिए एक मज़बूत आधार तैयार किया।
दूसरे दिन ईएसजी समेकन को मज़बूत करने के लिए सेक्टर-विशिष्ट दिशानिर्देश, वैश्विक और घरेलू आपूर्ति नेटवर्क में ज़िम्मेदार मूल्य शृंखला, प्रतिस्पर्धा और समावेशी विकास के लिए एमएसएमई में ईएसजी को मुख्यधारा में लाना, बीआरएसआर से आगे बढ़कर सेक्टरवार ईएसजी अंगीकरण और ईएसजी रिपोर्टिंग प्रारूप में पर्यावरणीय मेट्रिक्स पर नए सिरे से विचार करने जैसे विषयों पर उच्च-स्तरीय पैनल चर्चाएं होंगी और अंत में समापन सत्र होगा। इसलिए, दो दिनों के विस्तृत एजेंडा के साथ, आईआईसीए का एनसीआरबीसी 2026- जिसे यूनिसेफ, पार्टनर्स इन चेंज और एसीसीए जैसे प्रमुख साझेदार; आईसीएआई और जीएआईएन जैसे एसोसिएट साझेदार और यूएन विमन, सीईईडब्ल्यू, डब्ल्यूआरआई इंडिया और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन जैसे सत्र साझेदारों का सहयोग मिला है- का लक्ष्य ज़िम्मेदार कारोबार व्यवहार को भारत की 2047 तक एक विकसित, समावेशी और नैतिक रूप से मज़बूत राष्ट्र बनने की यात्रा का अहम हिस्सा बनाना है।
