नई दिल्ली (राजीव शर्मा): खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर चिंताएं बढ़ गई हैं, जिसके चलते सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया। निवेशक अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य घटनाक्रमों पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इस ताजा तनाव ने एक बार फिर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को चर्चा में ला दिया है, क्योंकि व्यापारियों को डर है कि शिपिंग (जहाजों के आवागमन) में किसी भी तरह की बाधा से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की उपलब्धता कम हो सकती है।
शुरुआती कारोबार के दौरान, ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के करीब पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) में भी चार प्रतिशत से अधिक की तेजी आई। यह उछाल उन रिपोर्टों के बाद आया जिनमें अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी ठिकानों को निशाना बनाकर नए हमले करने और उसके जवाब में तेहरान (ईरान) द्वारा जवाबी कार्रवाई करने की बात कही गई थी।
बाजार के जानकारों का कहना है कि उत्पादन संबंधी चिंताओं को पीछे छोड़ते हुए भू-राजनीतिक (geopolitical) अनिश्चितता अब तेल की कीमतों को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक बन गई है। हालांकि ओपेक प्लस (OPEC+) ने हाल ही में आने वाले महीनों में उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ाने की योजना की घोषणा की थी, लेकिन खाड़ी के रास्ते तेल के निर्बाध आवागमन को लेकर पैदा हुए डर ने आपूर्ति बढ़ने की उम्मीदों को दबा दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से हर दिन वैश्विक कच्चे तेल के कुल निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इस जलमार्ग या इसके आसपास किसी भी सैन्य गतिविधि का अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर तुरंत असर पड़ने की संभावना रहती है।
वित्तीय बाजारों पर भी दिखा असर
तेल की कीमतों में इस ताजा उछाल ने वित्तीय बाजारों में भी सतर्कता का माहौल पैदा कर दिया है। एशियाई शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच निवेशकों द्वारा सुरक्षित संपत्तियों का रुख करने से अमेरिकी डॉलर की मांग मजबूत हुई।
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि तनाव जारी रहता है, तो कच्चे तेल की ऊंची कीमतें कई अर्थव्यवस्थाओं में एक बार फिर मुद्रास्फीति (महंगाई) को बढ़ा सकती हैं। केंद्रीय बैंक, जो पहले से ही अनिश्चित आर्थिक स्थितियों से जूझ रहे हैं, यदि आने वाले हफ्तों में ऊर्जा की लागत बढ़ती रही तो उनके सामने अतिरिक्त चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भर देशों द्वारा इन घटनाक्रमों पर करीब से नज़र रखने की उम्मीद है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क में लंबे समय तक होने वाली बढ़ोतरी का असर अंततः उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए ईंधन की ऊंची कीमतों के रूप में सामने आ सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि तेल बाजारों की दिशा काफी हद तक पश्चिम एशिया में राजनयिक और सैन्य घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। यदि यह संघर्ष लंबा खींचता है और शिपिंग लेन या तेल बुनियादी ढांचे को प्रभावित करता है, तो कीमतें काफी ऊपर जा सकती हैं, जबकि तनाव कम होने के संकेतों से बाजार में उतार-चढ़ाव को थामने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल, व्यापारियों का पूरा ध्यान खाड़ी के घटनाक्रमों पर टिका हुआ है, और भू-राजनीतिक सुर्खियां पारंपरिक मांग-आपूर्ति के समीकरणों की तुलना में कच्चे तेल की कीमतों को अधिक प्रभावित करती रहेंगी।
