चंडीगढ़(गुरप्रीत सिंह): मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन से प्रेरित फिल्म ‘सतलुज’ के इर्द‑गिर्द चल रही बहस ने एक बार फिर उनकी गुमशुदगी और मौत से जुड़े ऐतिहासिक हत्या मामले पर सार्वजनिक ध्यान केंद्रित कर दिया है।
हाल के एक घटनाक्रम में नाभा ओपन एग्रीकल्चर जेल ने खालरा हत्याकांड में उम्रकैद की सज़ा काट रहे दोषी पूर्व उप पुलिस अधीक्षक (DSP) जसपाल सिंह के ठिकाने की पुष्टि करने के लिए होशियारपुर पुलिस से अनुरोध किया है।
पुलिस अधिकारियों ने पुष्टि की कि जसपाल सिंह को उनके पैतृक गाँव में ढूंढने के लिए एक टीम तैनात की गई है। अधिकारियों के अनुसार, यह अभ्यास उनकी ज़मानत की स्थिति से जुड़े नियमित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हिस्सा है।
जसपाल सिंह को मई 2023 में ओपन जेल से ज़मानत पर रिहा किया गया था, जब उन्होंने 1 लाख रुपये का आवश्यक निजी बॉन्ड और श्योरिटी राशि जमा की थी। यद्यपि वे अभी भी उम्रकैद की सज़ा काट रहे हैं, उनकी रिहाई उस समय जारी कानूनी निर्देशों के तहत हुई जब उनकी अग्रिम रिहाई से जुड़ा मामला लंबित था।
सूत्रों ने कहा कि पंजाब सरकार ने 2022 में उनकी अग्रिम रिहाई की सिफारिश करते हुए एक प्रस्ताव राज्यपाल को भेजा था, लेकिन इस सिफारिश पर अभी अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
जेल अधिकारियों ने समझाया कि ज़मानत पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक अवमानना मामले में आए आदेशों के बाद दी गई थी। अदालत की व्याख्या के अनुसार, यदि अग्रिम रिहाई के प्रस्ताव पर निर्धारित अवधि के भीतर निर्णय नहीं लिया जाता, तो कैदी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अंतिम आदेश पारित होने तक ज़मानत पर रह सकता है।
इसी कानूनी स्थिति के आधार पर पटियाला की एक अदालत ने जसपाल सिंह की ज़मानत पर रिहाई का आदेश दिया था।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि कोविड‑19 महामारी के दौरान राज्य की अस्थायी रिहाई नीति के तहत उन्हें अन्य पात्र कैदियों के साथ पैरोल भी दी गई थी।
इससे पहले जसपाल सिंह ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का रुख करते हुए अग्रिम रिहाई की मांग की थी। बाद में उन्होंने याचिका वापस ले ली, जिसके बाद अदालत ने उन्हें अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। तब से वे अपनी अधिकांश सज़ा नाभा ओपन एग्रीकल्चर जेल में काट रहे हैं।
यह मामला 1995 में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के अपहरण और हत्या से जुड़ा है, जिसने पंजाब के उग्रवाद‑काल के दौरान कथित अवैध गुमशुदगियों और गुप्त अंतिम संस्कारों के आरोपों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया था।
2005 में पटियाला स्थित एक विशेष CBI अदालत ने इस मामले में कई पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया। पूर्व DSP जसपाल सिंह को उम्रकैद की सज़ा दी गई, जबकि कई अन्य अधिकारियों को भी कारावास की सजाएँ सुनाई गईं।
अपील की प्रक्रिया के दौरान पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने जसपाल सिंह की उम्रकैद की सज़ा बरक़रार रखी। अदालत ने एक आरोपी को बरी कर दिया, जबकि चार अन्य दोषी पुलिस अधिकारियों की सज़ा सात वर्ष के कारावास से बढ़ाकर उम्रकैद कर दी।
‘सतलुज’ से पैदा हुई नई सार्वजनिक दिलचस्पी ने खालरा केस को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है और पंजाब के सबसे महत्वपूर्ण मानवाधिकार मामलों में से एक को लेकर बहसों को दोबारा जीवित कर दिया है।
