नई दिल्ली(राजीव शर्मा):श्री दिग्विजय सिंह, संसद सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता में विभाग-संबंधित शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने शिक्षा मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग की अनुदान मांगों (2025-26) से संबंधित 364वें प्रतिवेदन में अंतर्विष्ट समिति की सिफारिशों/समुक्तियों पर सरकार द्वारा की गई कार्रवाई संबंधी 381वाँ प्रतिवेदन दिनांक 16 जून, 2026 को माननीय सभापति, राज्य सभा को प्रस्तुत किया ।
- समिति द्वारा दिनांक 1 जून, 2026 को आयोजित अपनी बैठक में की गई कार्रवाई संबंधी प्रतिवेदन पर विचार किया गया था तथा उसे स्वीकार किया गया था। प्रतिवेदन में समिति द्वारा की गई समुक्तियाँ/सिफारिशें इसके साथ संलग्न हैं।
- प्रतिवेदन निम्नलिखित लिंक पर भी उपलब्ध है:-
https://sansad.in/rs/committees/16?departmentally-related-standing-committees
381वाँ प्रतिवेदन
समिति की सिफारिशें/समुक्तियाँ – एक नजर में
- समिति नोट करती है कि उपरोक्त दोनों सिफारिशों पर दिया गया उत्तर केवल उत्कृष्ट संस्थान योजना के प्रक्रियात्मक फ्रेमवर्क की पुनरावृत्ति मात्र है और समिति द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं का समाधान नहीं करता है। पहले विषय पर, समिति नोट करती है कि इस योजना के शुभारंभ के आठ वर्ष बीत जाने के बाद भी, अधिदेशित बीस उत्कृष्ट संस्थानों में से केवल बारह को ही अधिसूचित किया गया है। दूसरे विषय पर, सामाजिक विज्ञान, मानविकी तथा विकास अध्ययन के क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले देश के वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त संस्थानों, जैसे कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, को योजना के दायरे में शामिल करने संबंधी समिति की सिफारिश पर विभाग द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई है। समिति सिफारिश करती है कि विभाग शेष आठ उत्कृष्ट संस्थानों की पहचान एवं अधिसूचना हेतु समयबद्ध कार्य-योजना निर्धारित करे तथा योजना के दायरे के विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन भी कराए। (पैरा 3.3.8 और 3.3.10)
- समिति, एआईएसएचई वर्ष 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के डेटा संग्रह के संबंध में विभाग द्वारा दिए गए उत्तर को नोट करती है। हालांकि, समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि तीन वर्षों की रिपोर्ट अभी भी अप्रकाशित हैं और इन्हें एक साथ जारी किया जाना है, जो एक वार्षिक सर्वेक्षण के उद्देश्य को ही विफल कर देता है। समिति दोहराती है कि छात्र-स्तरीय डेटा संग्रह प्रणाली को यथाशीघ्र अपनाया जाए। वह यह भी सिफारिश करती है कि विभाग को एआईएसएचई के प्रकाशन के लिए एक निश्चित वार्षिक समय-सीमा स्थापित करनी चाहिए, क्योंकि डेटा तक पहुंच में किसी भी प्रकार का विलंब उच्च शिक्षा में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को कमजोर करता है, विशेष रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ अन्य पिछड़ा/आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के नामांकन की निगरानी के संदर्भ में। (पैरा 3.9.9)
- समिति शिक्षा ऋण सहायता फ्रेमवर्क पर विभाग के उत्तरों को नोट करती है और यह समुक्ति करती है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए वित्तीय सहायता संरचना में एक प्रणालीगत अपर्याप्तता है। ब्याज छूट के प्रश्न पर, समिति प्रधानमंत्री विद्यालक्ष्मी योजना के अंतर्गत 8 लाख रुपये तक की पारिवारिक आय वाले छात्रों के लिए 3 प्रतिशत ब्याज छूट के विस्तार को स्वीकार करती है। हालांकि, चूंकि यह लाभ केवल ‘गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा संस्थानों’ के छात्रों तक ही सीमित है, इसलिए गैर-गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा संस्थानों में नामांकित छात्रों की एक विशाल संख्या इससे निरंतर वंचित बनी हुई है।
इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा प्रोत्साहन-केंद्रीय क्षेत्र ब्याज छूट योजना के तहत 4.5 लाख रुपये की आय सीमा वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं को देखते हुए अत्यधिक अपर्याप्त है। इसलिए समिति दोहराती है कि पारिवारिक आय की सीमा को सभी योजनाओं, सभी प्रकार के पाठ्यक्रमों और सभी संस्थानों में संस्थागत गुणवत्ता रैंकिंग की किसी भी शर्त के बिना, समान रूप से बढ़ाकर 8 लाख रुपये किया जाना चाहिए।
प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण सीमा पर, समिति भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इसे 20 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख रुपये किए जाने को सही दिशा में उठाया गया एक कदम मानती है। हालांकि, यह समिति द्वारा अनुशंसित 50 लाख रुपये की सीमा से काफी कम है। उच्च शिक्षा की तेजी से बढ़ती लागत और प्रधानमंत्री विद्यालक्ष्मी योजना के तहत बिना किसी सुरक्षा के ऋण की उपलब्धता को देखते हुए, संशोधित सीमा अपर्याप्त बनी हुई है। इसलिए, समिति अपनी सिफारिश को दोहराती है कि विभाग वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के साथ सक्रिय समन्वय स्थापित करे ताकि प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण की सीमा को बढ़ाकर 50 लाख रुपये किया जा सके।
शिक्षा ऋण के लिए क्रेडिट गारंटी फंड योजना (सीजीएफएसईएल) पर, समिति इस बात पर प्रकाश डालना चाहेगी कि शिक्षा लागत में एक दशक के दौरान हुई काफी बढ़ोतरी के बावजूद, 7.5 लाख रुपये की गारंटी कवर सीमा वर्ष 2015 से अपरिवर्तित बनी हुई है। योजना के नवीनीकरण के समय इस सीमा पर पुनर्विचार करने का एक सामान्य आश्वासन संतोषजनक नहीं है। समिति सरकार से आग्रह करती है कि गारंटी कवर को अविलंब बढ़ाकर 20 लाख रुपये किया जाए।
(पैरा 3.13.13, 3.13.14 और 3.13.15)
- समिति नोट करती है कि दिया गया उत्तर केवल सामान्य प्रक्रियाओं और नियमों की बात करता है, परंतु जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संबंध में उठायी गई विशिष्ट समस्या की पूर्णतः उपेक्षा करता है, जहाँ कई पात्र संकाय सदस्य वर्षों से देय होने के बावजूद पदोन्नत नहीं किए गए हैं। इसलिए, समिति विभाग को अपनी पिछली सिफारिश पुनः दोहराती है कि उसे ऐसे विशिष्ट मामलों की जांच करनी चाहिए और त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए ताकि योग्य और पात्र उम्मीदवार को समय पर पदोन्नति मिल सके।
(पैरा 3.16.9)
- समिति नोट करती है कि उपर्युक्त पैरा 8 से 10 में अंतर्विष्ट समुक्तियों के उत्तर में विभाग द्वारा प्रस्तुत किए गए उत्तरों में विशिष्टता का अभाव है। इसलिए, समिति विभाग को यह सिफारिश करती है कि उत्तर व्यापक होने चाहिए तथा वे अनिर्णायक या सामान्य शब्दों में व्यक्त नहीं होने चाहिए। इसके अतिरिक्त, अध्याय-III के उपर्युक्त पैरा 8 से 10 में अंतर्विष्ट समुक्तियों का एक विस्तृत उत्तर समिति के विचारार्थ यथाशीघ्र प्रदान किया जाए।
(पैरा 3.16.15, 3.16.16, 3.16.17)
- समिति, उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में उच्चाधिकार प्राप्त संचालन समिति के गठन सहित मंत्रालय द्वारा उठाए गए कदमों को नोट करती है। हालांकि, इन उपायों के बावजूद प्रश्न-पत्र लीक होने की घटनाएँ अब भी हो रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ती हैं तथा विद्यार्थियों में अत्यधिक चिंता उत्पन्न होती है। इस विषय पर समिति 371वें प्रतिवेदन में की गई अपनी सिफारिशों को पुनः दोहराती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन हेतु समयबद्ध कार्य-योजना यथाशीघ्र प्रकाशित करे। (पैरा 3.18.2)
- समिति आईसीएसएसआर से संबद्ध अनुसंधान संस्थानों और क्षेत्रीय केंद्रों में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन में हो रहे निरंतर विलंब को नोट करती है। इस विषय को समिति द्वारा अपने 364वें प्रतिवेदन में इंगित किया गया था तथा बाद में अपने 371वें प्रतिवेदन में पुनः दोहराया गया। इस विलंब का प्रभाव इन संस्थानों की गुणवत्तापूर्ण शोधकर्ताओं को आकर्षित करने एवं उन्हें बनाए रखने की क्षमता पर पड़ रहा है। समिति का मत है कि विभाग को इस विषय को वित्त मंत्रालय के साथ सक्रिय रूप से उठाना चाहिए तथा सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को बिना किसी और विलंब के लागू करना चाहिए। (पैरा 3.20.1)
- समिति नोट करती है कि अध्याय-III के उपर्युक्त पैरा 13 में अंतर्विष्ट समुक्तियों के उत्तर में विभाग द्वारा प्रस्तुत किए गए उत्तरों में विशिष्टता का अभाव है। इसलिए, समिति विभाग को यह सिफारिश करती है कि उत्तर व्यापक होने चाहिए तथा वे अनिर्णायक या सामान्य शब्दों में व्यक्त नहीं होने चाहिए। तदनुसार, अध्याय-III के उपर्युक्त पैरा 13 में अंतर्विष्ट समुक्तियों का एक विस्तृत उत्तर समिति के विचारार्थ यथाशीघ्र प्रदान किया जाए। (पैरा 3.22.3)
- समिति नोट करती है कि विभाग ने केवल मौजूदा वित्तपोषण तंत्र को ही दोहराया है, जिसे समिति की मूल सिफारिश में पहले ही स्वीकार किया जा चुका था। अतः, समिति पुनः दोहराती है कि वर्ष 2010 से बिना किसी मुद्रास्फीति समायोजन के स्थिर रखी गई 128 करोड़ रुपये की स्वीकृत पूंजीगत लागत वित्तीय स्थिरता प्राप्त करने के लिए पूर्णतः अपर्याप्त है। वह यह भी सिफारिश करती है कि विभाग सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत स्थापित सभी 20 भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों की व्यापक वित्तीय समीक्षा करे, पूंजीगत लागतों को वर्तमान मूल्य स्तरों के अनुरूप अनुक्रमित करे, और यथाशीघ्र एकमुश्त अनुदान-आधारित पूंजीगत सहायता के लिए एक ठोस प्रस्ताव तैयार करे। (पैरा 3.23.4)
- समिति नोट करती है कि अध्याय-III के उपर्युक्त पैरा 15 से 18 में अंतर्विष्ट समुक्तियों के उत्तर में विभाग द्वारा प्रस्तुत किए गए उत्तरों में विशिष्टता का अभाव है। इसलिए, समिति विभाग को यह सिफारिश करती है कि उत्तर व्यापक होने चाहिए तथा वे अनिर्णायक या सामान्य शब्दों में व्यक्त नहीं होने चाहिए। इसके अतिरिक्त, अध्याय-III के उपर्युक्त पैरा 15 से 18 में अंतर्विष्ट समुक्तियों का एक विस्तृत उत्तर समिति के विचारार्थ यथाशीघ्र प्रदान किया जाए।
(पैरा 3.23.5, 3.23.6, 3.23.7 और 3.24.1)
