नई दिल्ली (राजीव शर्मा/गुरप्रीत सिंह): प्रथम विश्व युद्ध के एक सदी से भी अधिक समय बाद, आधिकारिक युद्ध रिकॉर्ड से गायब रहे लगभग 10,000 भारतीय सैनिकों को आखिरकार राष्ट्रमंडल युद्ध कब्र आयोग (CWGC) द्वारा मान्यता दे दी गई है। यह कदम दशकों में आयोग के हताहत डेटाबेस (casualty database) में किए गए सबसे बड़े संशोधनों में से एक है और इसके जरिए अविभाजित पंजाब के हजारों सैनिकों को उनका उचित सम्मान वापस मिला है।
इन नए पहचाने गए नामों का खुलासा ‘पंजाब रजिस्टर्स प्रोजेक्ट’ (Punjab Registers Project) के माध्यम से हुआ है, जो CWGC, यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन और ग्रीनविच विश्वविद्यालय की एक संयुक्त पहल है। शोधकर्ताओं ने लाहौर संग्रहालय में संरक्षित ऐतिहासिक सैन्य रजिस्टरों की जांच की, जिनमें युद्ध के वर्षों के दौरान पंजाब से भर्ती हुए लाखों सैनिकों का दस्तावेजीकरण किया गया था।
वर्षों के सत्यापन (verification) के बाद, आयोग ने पुष्टि की कि 9,909 सैनिक, जिन्हें पहले इसके रिकॉर्ड में शामिल नहीं किया गया था, उन्हें अब प्रथम विश्व युद्ध के हताहतों के रूप में औपचारिक रूप से याद किया जाएगा (श्रद्धांजलि दी जाएगी)।
दुर्लभ अभिलेखों (Archives) से हुआ खुलासा
यह परियोजना उन दुर्लभ अभिलेखीय दस्तावेजों पर आधारित थी जिसमें इस क्षेत्र के सैनिकों की भर्ती का विवरण दर्ज था। शोधकर्ताओं ने पाया कि संघर्ष के दौरान जान गंवाने वाले कई पुरुषों को कभी आधिकारिक तौर पर याद नहीं किया गया, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि उनकी मृत्यु भारत के भीतर या उन क्षेत्रों में हुई थी जिन्हें उस अवधि की प्रशासनिक प्रथाओं के तहत सक्रिय युद्ध क्षेत्र (active battle zones) के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया था।
इन नामों को शामिल किए जाने से उन कई वंशजों को लंबे समय से प्रतीक्षित राहत मिलने की उम्मीद है, जिनके पास युद्ध के दौरान सेवा देने वाले अपने रिश्तेदारों के बारे में बहुत कम या कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं था।
उन्हीं में से एक लेस्टर (Leicester) के रहने वाले डॉ. इंदर सिंह पलहेय हैं, जिनके परदादा केसर सिंह सैन्य सेवा के लिए घर से निकले थे लेकिन कभी वापस नहीं लौटे। वर्षों तक, परिवार के पास उनके बलिदान की केवल मौखिक कहानियाँ थीं। अब अपडेट किए गए रिकॉर्ड ने उनकी सेवा के विवरण की पुष्टि की है, जिससे परिवार पहली बार उनके सैन्य इतिहास का पता लगाने में सक्षम हुआ है।
ऐतिहासिक भूलों को सुधारने की दिशा में बड़ा कदम
इतिहासकारों का मत: इस परियोजना से जुड़े इतिहासकारों ने इस घटनाक्रम को ऐतिहासिक भूलों को सुधारने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने संज्ञान लिया कि हालांकि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अविभाजित पंजाब के लाखों सैनिकों ने ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा दी थी, लेकिन सर्वोच्च बलिदान देने के बावजूद हजारों को कभी समान मान्यता नहीं मिली।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस संघर्ष के दौरान पंजाब के लगभग पांच लाख रंगरूटों (recruits)—जिनमें सिख, मुस्लिम, हिंदू और ईसाई शामिल थे—ने अपनी सेवा दी थी, जो ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में किसी भी क्षेत्र की तरफ से दिया गया सबसे बड़ा योगदान था।
| मुख्य बिंदु | विवरण |
| नए मान्यता प्राप्त सैनिक | 9,909 भारतीय सैनिक (मुख्य रूप से अविभाजित पंजाब से) |
| सहयोगी संस्थान | CWGC, यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन और ग्रीनविच यूनिवर्सिटी |
| ऐतिहासिक स्रोत | लाहौर संग्रहालय में संरक्षित सैन्य रजिस्टर |
CWGC ने कहा कि यह संशोधन यह सुनिश्चित करने के उसके निरंतर प्रयासों को दर्शाता है कि विश्व युद्धों के दौरान मारे गए प्रत्येक सैनिक को याद रखा जाए, चाहे उसकी मृत्यु कहीं भी हुई हो। अधिकारियों ने इस कवायद को द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से आयोग के सबसे महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुधारों में से एक बताया है।
यह अपडेटेड डेटाबेस न केवल हजारों अनदेखे सैनिकों की पहचान को पुनर्स्थापित करता है, बल्कि अविभाजित भारत के सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय भी जोड़ता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि आने वाली पीढ़ियां इतिहास के सबसे घातक संघर्षों में से एक के दौरान सेवा करने वाले नायकों के सटीक रिकॉर्ड तक पहुंच सकें।
