टोरंटो (राजीव शर्मा): आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने टोरंटो में आयोजित ‘हिंदू विश्व बंधु – एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’ सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारत के सभ्यतागत दृष्टिकोण और सह-अस्तित्व, करुणा व सेवा की उसकी प्राचीन परंपराओं पर प्रकाश डाला।
भागवत ने कहा कि हिंदू होने की अवधारणा को किसी विशेष भाषा, धार्मिक प्रथा या जीवनशैली तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने इन भिन्नताओं को मानवीय विविधता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बताया और कहा कि हिंदू परंपरा इन्हें स्वीकार करती है और इनका सम्मान करती है।
भारत के इतिहास का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि इस देश ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़न का सामना करने वाले लोगों को शरण दी है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इतिहास के अलग-अलग दौर में भारत आए समुदाय, जिनमें आक्रांताओं के रूप में आने वाले भी शामिल थे, अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए अंततः भारतीय समाज का हिस्सा बन गए।
‘जीत या विजय के बल पर भारत नहीं बना विश्वगुरु’
आरएसएस प्रमुख ने भारत की भौगोलिक सीमाओं से परे उसके प्रभाव पर भी बात की। उन्होंने कहा कि यद्यपि भारत को कभी-कभी महाशक्ति कहा जाता है, लेकिन इसकी सभ्यतागत यात्रा सत्ता की चाहत या अन्य देशों को जीतने पर आधारित नहीं थी।
भागवत के अनुसार, भारत ने ‘महाशक्ति’ बनकर नहीं, बल्कि अपने चरित्र और मानवता के प्रति अपने योगदान के जरिए ‘विश्वगुरु’ का दर्जा हासिल किया।
उन्होंने भारत के पूर्वजों द्वारा दुनिया के दूर-दराज के हिस्सों—मेक्सिको से लेकर साइबेरिया और दक्षिण पूर्व एशिया तक के क्षेत्रों—में की गई यात्राओं का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि इन यात्राओं का उद्देश्य क्षेत्रों पर कब्जा करना नहीं, बल्कि ज्ञान और सभ्यतागत मूल्यों को साझा करना था।
भागवत ने भारत के योगदान के उदाहरण के रूप में खगोल विज्ञान और आयुर्वेद जैसे विषयों का उल्लेख किया, साथ ही इसके सांस्कृतिक मूल्यों के प्रसार पर भी जोर दिया।
‘विविधता अपने आप में एकता का एक रूप है’
अपने संबोधन के दौरान भागवत ने दूसरों की सहायता करने की भारत की परंपरा पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि जरूरतमंदों की मदद करना, यहां तक कि बिना मांगे भी, देश के सांस्कृतिक लोकाचार का हिस्सा है।
उन्होंने आगे समझाया कि भारतीय परंपराएं दुनिया को परस्पर जुड़ा हुआ मानती हैं और लोगों को जीवन के विभिन्न रूपों में एकता की भावना को पहचानने के लिए प्रेरित करती हैं।
भागवत के अनुसार, भारत में विभिन्नताओं को ऐतिहासिक रूप से कभी भी एकता में बाधा के रूप में नहीं देखा गया है। इसके बजाय, उन्होंने कहा कि देश का सभ्यतागत दृष्टिकोण यह सिखाता है कि विविधता अपने आप में एकजुटता की एक और अभिव्यक्ति हो सकती है।
टोरंटो में उनका यह संबोधन भारत की सांस्कृतिक पहचान, विविधता के प्रति इसके दृष्टिकोण और इसकी सीमाओं से परे लोगों व समाजों के साथ इसके ऐतिहासिक संबंधों पर केंद्रित रहा।
