किसान आंदोलन बिगाड़ेगा BJP-AAP का चुनावी गणित: ग्रामीण वोट बैंक पर असर; पंजाब में कांग्रेस, अकाली दल और वारिस पंजाब दे को कैसे फायदा

पंजाब में एक बार फिर किसानों ने मोर्चे लगाने शुरू कर दिए। चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर समेत राज्य के अलग-अलग हिस्सों में किसान संगठनों ने सात-सात दिन के मोर्चे लगाए हैं। किसानों के मोर्चों ने इस बार भाजपा व आप दोनों के चुनावी गणित को प्रभावित करना शुरू कर दिया।

किसानों ने इस बार केंद्र के साथ राज्य की सत्ता पर काबिज AAP सरकार के खिलाफ भी मोर्चा खोला है। एमएसपी की कानूनी गारंटी, व्यापक कर्ज माफी, अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौतों को रद्द करने, कृषि लागत घटाने और ग्रामीण मजदूरों के लिए पेंशन योजना जैसी दूरगामी और बुनियादी मांगों को लेकर किसान सड़कों पर डटे हैं।

भाजपा व आप का विरोध होता देख कांग्रेस व अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने अपना सारा फोकस किसानों की गतिविधियों पर कर दिया है। कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और वारिस पंजाब दे जैसे दल इसे ग्रामीण वोट बैंक में अपनी खोई हुई पकड़ वापस पाने के सुनहरे अवसर के रूप में देख रहे हैं।

चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर किसानों का पक्का मोर्चा चल रहा है।

चंडीगढ़-मोहाली बॉर्डर पर किसानों का पक्का मोर्चा चल रहा है।

किसान आंदोलन कैसे बिगाड़ सकते हैं भाजपा-AAP का गणित, एक्सपर्ट से जानिए…

1. केंद्र और राज्य के खिलाफ एक साथ मोर्चा: पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप सिंह का कहना है कि किसान संगठनों ने केंद्र और पंजाब सरकार दोनों के खिलाफ एक साथ मोर्चा खोला है। शंभू और खनौरी बॉर्डरों पर पिछले समय में हुए घटनाक्रमों, पुलिस कार्रवाई और किसान मोर्चों से गायब हुई ट्रैक्टर-ट्रॉलियों व अन्य सामान के मुआवजे का मुद्दा अब तूल पकड़ चुका है। किसान नेताओं का आरोप है कि राज्य सरकार ने न केवल आंदोलनकारियों की सुरक्षा व सहायता में ढिलाई बरती, बल्कि वादे के मुताबिक नुकसान की भरपाई भी नहीं की।

उन्होंने कहा कि गांवों में अब आम आदमी पार्टी के विधायकों और नेताओं के खिलाफ पोस्टर-होर्डिंग्स लगाकर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। कृषि लागत, फसल विविधीकरण और राज्य-स्तरीय मुआवजे से जुड़े मुद्दों के कारण सत्तारूढ़ दल को ग्रामीण क्षेत्रों में भारी जन-असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार से एमएसपी की कानूनी गारंटी और ट्रेड डील रद्द करने की मांग को लेकर किसान अड़े हुए हैं।

2. आप के सामने अपना गढ़ बचाने की चुनौती: पवनदीप शर्मा का कहना है कि 2020-21 के आंदोलन में आम आदमी पार्टी ने किसानों का खुलकर समर्थन किया था, जिसका सीधा फायदा उसे 2022 के चुनाव में 92 सीटें जीतकर मिला था। लेकिन सरकार बनने के बाद अब समीकरण बदल चुके हैं। शंभू और खनौरी मोर्चों पर हुई पुलिस कार्रवाई, किसान आंदोलनों के प्रति ढुलमुल रवैये का आरोप और स्थानीय कृषि समस्याओं के हल न होने से ग्रामीण क्षेत्रों में भगवंत मान सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी है।

किसान नेता सरवन सिंह पंधेर के अनुसार, मोर्चों के दौरान हुए नुकसान और गायब हुई गाड़ियों के मुआवजे पर राज्य सरकार का वादा अधूरा रहा। ग्रामीण पंजाब, जो आप का सबसे मजबूत चुनावी स्तंभ माना जाता था, वहां से वोट बैंक छिटकने का सीधा खतरा पैदा हो गया है। यदि मान सरकार जल्द ही किसान संगठनों को संतुष्ट करने में विफल रहती है, तो आगामी चुनावों में उसके विधायकों को गांवों में प्रवेश करते समय भारी जन-आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है।

3. ग्रामीण वोट होगा बैंक प्रभावित: पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि 2020-21 के कृषि कानून विरोधी आंदोलन का असर भाजपा अब तक झेल रही है। किसान आंदोलन के कारण 2022 के विधानसभा चुनाव में संयुक्त किसान मोर्चा की अपीलों के चलते भाजपा को ग्रामीण इलाकों में भारी राजनीतिक विरोध सहना पड़ा। स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि कई ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी को अपने चुनावी बूथ तक लगाने की अनुमति नहीं मिली थी।

उन्होंने कहा कि भाजपा ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव में राज्य की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। ऐसे में मालवा और दोआबा जैसे विशाल ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

4. किसानों के प्रति भाजपा ने बदली रणनीति: पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि किसानों के लगातार विरोध के बीच पंजाब में अपनी जड़ें जमाने का प्रयास कर रही भाजपा को यह भली-भांति अहसास हो गया है कि किसानों को साधे बिना राज्य की सत्ता तक पहुंचना संभव नहीं है। इसी रणनीति के तहत केंद्र और पड़ोसी राज्य हरियाणा की भाजपा सरकारों ने अपने रुख में बड़ा बदलाव किया है। टकराव की स्थिति को टालने और किसानों के बीच सकारात्मक संदेश देने के लिए भाजपा नेतृत्व अब तुरंत संवाद की नीति पर काम कर रहा है।

उन्होंने कहा कि हाल ही में जब किसानों ने दिल्ली कूच का आह्वान किया और हरियाणा पुलिस ने उन्हें शंभू बॉर्डर पर रोका, तो गतिरोध बढ़ाने के बजाय हरियाणा सरकार के मंत्री तुरंत वार्ता के लिए मौके पर पहुंचे। उन्होंने किसानों की सीधी बातचीत केंद्र सरकार के उच्च अधिकारियों से करवाई, जिससे सीमा पर पक्का मोर्चा लगाने की नौबत टल गई। इसी संवाद प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दिल्ली में किसान प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की और उनकी मांगों का न्यायसंगत समाधान निकालने का ठोस आश्वासन दिया। भाजपा का स्पष्ट लक्ष्य कम्युनिकेशन गैप को खत्म करना है ताकि 2020 जैसी टकराव वाली स्थितियां दोबारा पैदा न हों और ग्रामीण क्षेत्रों में उसका बढ़ता जनाधार प्रभावित न हो।

5. 2017 से 2024 तक पंजाब का बदलता सियासी गणित: पॉलिटिकल एक्सपर्ट वैवस्वत वेंकट का कहना है कि पंजाब का राजनीतिक परिदृश्य पिछले आठ वर्षों में भारी बदलावों से गुजरा है। वोट प्रतिशत के आंकड़े यह साफ दर्शाते हैं कि कैसे आंदोलनों और जन-असंतोष ने स्थापित राजनीतिक ताकतों के आधार को हिलाया है।

उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो साफ होता है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में आप ने 42.01% वोट हासिल करके प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर घटकर 26.02% पर आ गया। दूसरी तरफ, भाजपा का वोट प्रतिशत 2022 के 6.60% से बढ़कर 2024 में 18.56% जरूर हुआ, लेकिन यह बढ़त मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक सीमित रही। ग्रामीण विरोध के चलते पार्टी लोकसभा में एक भी सीट जीतने में नाकाम रही।

कांग्रेस, अकाली दल और वारिस पंजाब दे पर असर

  • कांग्रेस: कांग्रेस पार्टी के लिए यह स्थिति दोहरा राजनीतिक लाभ लेने का अवसर है। वह एक साथ केंद्र की भाजपा सरकार और राज्य की आप सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 7 सीटें जीतकर कांग्रेस ने अपनी वापसी के संकेत दिए हैं। हालांकि, केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। किसानों का भरोसा हासिल करने के लिए उसे उनके मुद्दों को सड़कों पर मजबूती से उठाना होगा।
  • शिरोमणि अकाली दल: तीन कृषि कानूनों के मुद्दे पर भाजपा से गठबंधन तोड़ने वाला अकाली दल 2022 में 18.38% और 2024 में 13.42% वोट पर सिमट गया। बेअदबी के मामलों को लेकर पंथिक और ग्रामीण मतदाता अब भी पार्टी से दूरी बनाए हुए हैं। अकाली दल के लिए यह आंदोलन अपने पारंपरिक ग्रामीण वोट बैंक को वापस पाने का आखिरी अवसर हो सकता है।
  • वारिस पंजाब दे: राज्य में नए राजनीतिक और सामाजिक विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे पंथिक संगठन और ‘वारिस पंजाब दे’ के समर्थक भी इस किसान असंतोष का लाभ उठाकर ग्रामीण युवाओं व किसानों के बीच अपनी पैठ गहरी करने की होड़ में शामिल हैं।
By Gurpreet Singh

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *