नई दिल्ली(राजीव शर्मा): इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) ने 62,500 करोड़ रुपये के बजट के साथ मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (एमपीएमएस) की घोषणा की है। इस योजना का उद्देश्य बड़े पैमाने पर उत्पादन के जरिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, अधिक घरेलू मूल्य संवर्धन (डीवीए) के माध्यम से मोबाइल विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाना है। यह योजना भारतीय मोबाइल फोन ब्रांडों को तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल करने, अधिक आर्थिक मूल्य सृजित करने और डिजाइन तथा अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में भारतीय पेटेंट को बढ़ावा देने में मदद करेगी। साथ ही, इससे रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि मोबाइल फोन विनिर्माण योजना से भारतीय स्वामित्व वाले मोबाइल ब्रांड, बौद्धिक संपदा और डिजाइन के विकास को बड़ा बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि डिजाइन, बौद्धिक संपदा एवं ब्रांड का स्वामित्व भारतीय होना चाहिए और साथ ही संबंधित बाजार खंड में वे सर्वश्रेष्ठ उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए बारीकी से मूल्यांकन करेगी कि बौद्धिक संपदा का स्वामित्व वास्तव में भारतीय है। साथ ही, उद्योग के साथ परामर्श करके गैर-वित्तीय और अन्य सहायता उपाय भी तैयार किए जाएंगे।
प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ दृष्टिकोण के कारण वित्त वर्ष 2014-15 के बाद से भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में सात गुना और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में ग्यारह गुना वृद्धि हुई है। इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र रोजगार उपलब्ध कराने वाले एक बड़े क्षेत्र के रूप में उभरा है, जिसमें विशेष रूप से दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों के युवा पुरुषों व महिलाओं के लिए अवसर निकल रहे हैं। कई विनिर्माण संयंत्र एक ही स्थान पर 5,000 से अधिक लोगों को रोजगार दे रहे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर यह संख्या 20,000 तक पहुंच गई है। इस वृद्धि की मुख्य वजह मोबाइल फोन विनिर्माण रहा है। आज भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन और निर्यात में मोबाइल फोन की बड़ी हिस्सेदारी है। मोबाइल फोन विनिर्माण ने वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत की स्थिति को मजबूत करने और देश को इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारत अब संख्या के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन गया है। भारत में इस्तेमाल होने वाले 99.2 प्रतिशत मोबाइल फोन आज ‘मेड इन इंडिया’ यानी भारत में निर्मित हैं। वर्ष 2025 में स्मार्टफोन भारत से निर्यात होने वाली सबसे बड़ी उत्पाद श्रेणी बन गए, जिन्होंने डीजल ईंधन और कटे हुए हीरों जैसी पारंपरिक रूप से सबसे अधिक निर्यात की जाने वाली वस्तुओं को भी पीछे छोड़ दिया।
बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए शुरू की गई ‘उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना’ (पीएलआई-एलएसईएम) देश की सबसे सफल पीएलआई योजनाओं में से एक रही है। इस योजना ने भारत को मोबाइल फोन विनिर्माण और निर्यात के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गई। इस क्षेत्र में विकास की गति को बनाए रखने और मोबाइल फोन के उत्पादन को और बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अब ‘मोबाइल फोन विनिर्माण योजना’ (एमपीएमएस) को अधिसूचित किया है।
एमपीएमएस की मुख्य विशेषताएं
इस योजना के दो लक्षित वर्ग हैं:
लक्षित वर्ग 1 (टीएस1): मोबाइल फोन विनिर्माण को बढ़ावा देना।
लक्षित वर्ग 2 (टीएस2): भारतीय मोबाइल फोन ब्रांडों को सहयोग देना।
इस योजना की अवधि पांच वर्ष निर्धारित की गई है, जो वित्त वर्ष 2026-27 से वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू रहेगी। टीएस2 के तहत आवेदन करने वालों को एक वर्ष की तैयारी अवधि दी जा सकती है। टीएस1 के लिए योजना में 2.25 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक अलग-अलग दरों पर प्रोत्साहन दिया जाएगा। वहीं, टीएस2 के तहत भारतीय ब्रांडों को 5 प्रतिशत का प्रोत्साहन मिलेगा और भारतीय डिजाइन तथा अनुसंधान एवं विकास के लिए 3 प्रतिशत का अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाएगा। इसके अलावा, योजना के तहत भारतीय ब्रांडों को गैर-वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाएगी।
इसके अलावा, इस योजना के तहत दोनों लक्षित वर्गों के लिए आवश्यक कलपुर्जों और उप-संयोजनों की घरेलू स्तर पर खरीद पर 1.5 प्रतिशत तक का अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाएगा। इस योजना के तहत मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियां आवेदन कर सकेंगी। इनमें भारत में पंजीकृत इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनियां भी शामिल होंगी। आवेदक की बिक्री और उसे मिलने वाले प्रोत्साहन की गणना संबंधित ब्रांड के आधार पर की जाएगी।
पात्रता मापदंड
टीएस1 के तहत भारत में पंजीकृत मोबाइल फोन विनिर्माण कंपनियां पात्र होंगी, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण सेवाएं या ईएमएस कंपनियां भी शामिल हैं। पात्र कंपनियों का वित्त वर्ष 2025-26 में कम से कम 10,000 करोड़ रुपये का कारोबार होना आवश्यक है। मौजूदा ब्रांडों को वित्त वर्ष 2025-26 की बिक्री के अतिरिक्त हर वर्ष 5,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वार्षिक बिक्री का लक्ष्य पूरा करना होगा। वहीं, नए ब्रांड तब पात्र होंगे, जब वे भारत में कुल 10,000 करोड़ रुपये की वार्षिक बिक्री हासिल कर लेंगे। इसके बाद उन्हें भी हर वर्ष 5,000 करोड़ रुपये की बिक्री का लक्ष्य पूरा करना होगा।
टीएस2 के तहत भारत में पंजीकृत मोबाइल फोन विनिर्माता कंपनियां पात्र होंगी, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण सेवाएं देने वाली कंपनियां भी शामिल हैं। इन कंपनियों का वित्त वर्ष 2025-26 में कम से कम 1,000 करोड़ रुपये का कारोबार होना आवश्यक है। साथ ही, उन्हें ‘भारतीय ब्रांड’ के लिए निर्धारित सभी मानदंडों को पूरा करना होगा। इसके तहत कंपनी का भारत में पंजीकृत या निगमित होना, उसकी बौद्धिक संपदा और ट्रेडमार्क का भारत में होना तथा प्रबंधन का नियंत्रण भारतीय नागरिकों के पास होना जरूरी है। कंपनी में 51 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिकों के पास होनी चाहिए। इसके अलावा, कंपनी के पास भारत में अपनी आंतरिक अनुसंधान एवं विकास तथा डिजाइन क्षमताएं भी होनी चाहिए।
घरेलू विनिर्माण को और गति देने तथा भारतीय मोबाइल फोन विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए, यह योजना प्रमुख कलपुर्जों और उप-संयोजनों की घरेलू सोर्सिंग पर 1.5 प्रतिशत तक का अतिरिक्त प्रोत्साहन प्रदान करती है। इसके लिए शर्त है कि किसी वित्तीय वर्ष में निर्मित कुल मोबाइल फोन इकाइयों में से कम से कम 25 प्रतिशत के लिए ऐसे कलपुर्जों का स्थानीय स्तर पर उत्पादन किया गया हो। यह अतिरिक्त प्रोत्साहन वास्तविक और मजबूत घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने तथा उसे और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से दिया जाएगा।
अपेक्षित परिणाम
इस योजना की अवधि के दौरान देश में मोबाइल फोन का कुल उत्पादन लगभग 39 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके साथ ही मोबाइल फोन के निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। मोबाइल फोन विनिर्माण योजना से लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की भी उम्मीद है। इससे आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा और वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत की स्थिति और मजबूत होगी।
