1965 की जंग में 10 मिनट की हवाई भिड़ंत: फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड टाइरोन कुक ने पाकिस्तानी सेबर विमानों का किया सामना

नई दिल्ली(राजीव शर्मा): फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड टाइरोन कुक के लिए 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की सबसे भीषण हवाई लड़ाइयों में से एक लगभग 10 मिनट तक चली थी। लेकिन पूर्वी भारत के कलाईकुंडा के ऊपर हुई यह मुठभेड़ भारतीय वायुसेना में उनके करियर के निर्णायक क्षणों में शामिल हो गई।

युद्ध के दौरान अपने कार्यों के लिए वीर चक्र से सम्मानित कुक का 18 सितंबर को नई दिल्ली के बेस अस्पताल में 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका निधन 7 सितंबर, 1965 को हुई उस हवाई लड़ाई के 61 साल बाद हुआ, जिसमें उन्होंने हंटर विमान उड़ाते हुए पाकिस्तानी सेबर लड़ाकू विमानों का सामना किया था।

बाद में कुक ने युद्ध में अपने दृष्टिकोण को भारतीय वायुसेना के जवानों के लिए एक सरल संदेश में बताया था: प्रशिक्षण पुस्तिकाओं को जानें, अपने विमान और उसकी सीमाओं को समझें, लेकिन तय तरीकों से आगे सोचने से न डरें।

एक हंटर के सामने तीन सेबर
7 सितंबर, 1965 को कुक अपने विंगमैन के साथ डमडम-कलाईकुंडा क्षेत्र में लड़ाकू हवाई गश्त का नेतृत्व कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें कलाईकुंडा हवाई अड्डे पर हमला कर रहे छह पाकिस्तानी सेबर विमानों के गठन को रोकने का आदेश दिया गया।

दोनों भारतीय पायलटों ने खतरे को बांट लिया। कुक ने दुश्मन के तीन विमानों से मुकाबला किया, जबकि उनके विंगमैन ने बाकी विमानों को संभाला।

हंटर और सेबर विमानों की अपनी-अपनी अलग खूबियां थीं। पाकिस्तानी विमान को मुड़ने की क्षमता में बढ़त हासिल थी, जबकि भारतीय हंटर अधिक गति और शक्ति से लैस था। तेजी से बदलती मुठभेड़ के दौरान कुक ने इन विशेषताओं का अपने पक्ष में इस्तेमाल किया।

यह लड़ाई बेहद कम ऊंचाई पर हुई, जिसमें विमान बार-बार अपनी स्थिति बदलते रहे। एक मौके पर कुक ने याद किया था कि वह एक विरोधी पायलट के हेलमेट पर लिखा नाम तक देख पाने के काफी करीब पहुंच गए थे।

यह मुठभेड़ करीब 10 मिनट तक चली, हालांकि कुक ने बाद में कहा था कि यह समय उन्हें काफी लंबा महसूस हुआ।

बिस्कुट के सहारे लड़ी गई लड़ाई
इस अभियान से जुड़ी परिस्थितियों ने इस कहानी में एक असामान्य पहलू भी जोड़ दिया।

बताया जाता है कि कुक उचित भोजन किए बिना ही लड़ाकू मिशन पर निकल गए थे। उनकी पहली उड़ान के दौरान नाश्ता पहुंचाने वाला वाहन अभी आया नहीं था। जब वह लौटे, तो उन्हें पता चला कि वाहन जा चुका था।

दूसरी बार उड़ान भरने से पहले वह केवल एक पैकेट बिस्कुट खा सके।

इन परिस्थितियों के बावजूद वह फिर लड़ाई में लौटे और हमला कर रहे विमानों का पीछा किया। एक सेबर पर गोलीबारी करने के बाद उन्होंने देखा कि दुश्मन का विमान हवा में टूट गया।

इसके बाद उन्होंने अपने हंटर को एक अन्य पाकिस्तानी विमान के पीछे ला लिया, लेकिन तब तक उनका गोला-बारूद खत्म हो चुका था। गोली चलाने में सक्षम न होने के बावजूद कुक ने विरोधी विमान पर दबाव बनाए रखा, जब तक कि बाकी दुश्मन विमान पीछे हट नहीं गए।

वीर चक्र दिलाने वाला प्रशस्ति-पत्र
कुक के आधिकारिक वीर चक्र प्रशस्ति-पत्र में दर्ज है कि क्षेत्र में भारतीय विमानभेदी तोपों की गोलीबारी के बावजूद उन्होंने पाकिस्तानी विमानों से मुकाबला किया। इसमें दुश्मन के गठन का सामना करते हुए उनके असाधारण कौशल और दृढ़ संकल्प की सराहना की गई है।

प्रशस्ति-पत्र के अनुसार, उन्होंने एक सेबर विमान को मार गिराया और इसके बाद दूसरे विमान के पीछे अनुकूल स्थिति में पहुंच गए। उनका गोला-बारूद खत्म हो जाने के बावजूद उन्होंने उस विमान पर दबाव बनाए रखा, जिससे बाकी पाकिस्तानी विमानों को पीछे हटने में योगदान मिला।

इस प्रशस्ति-पत्र में उनके साहस, नेतृत्व और कर्तव्य के प्रति समर्पण को मान्यता दी गई।

आखिरी बूंदों के ईंधन पर उड़ता विमान
कुक ने बाद में याद किया था कि यह मिशन अपनी सीमाओं के कितना करीब पहुंच गया था।

लैंडिंग के बाद एक वायुसैनिक ने कथित तौर पर देखा कि हंटर के पंख का एक हिस्सा मुड़ा हुआ था और उस पर वनस्पति के टुकड़े चिपके थे। इससे यह चिंता पैदा हुई कि विमान ने कितनी कम ऊंचाई पर उड़ान भरी थी। एक अन्य व्यक्ति ने विमान पर अवशेष देखे और समझा कि कुक ने अपनी बंदूकों से गोलीबारी की थी।

लेकिन सबसे नाटकीय क्षण विमान के जमीन पर उतरने के बाद आया। कुक के अनुसार, हंटर अभी रनवे पर टैक्सी कर ही रहा था कि उसका इंजन बंद हो गया, क्योंकि विमान का आखिरी बूंद तक ईंधन इस्तेमाल हो चुका था।

आगरा से आसमान तक
द्वितीय विश्व युद्ध के वर्षों में आगरा में बचपन बिताने के दौरान ही कुक की विमानन में रुचि पैदा हुई। इलाके के ऊपर उड़ते हरिकेन, स्पिटफायर और मस्टैंग जैसे विमानों को देखकर उनके मन में पायलट बनने की इच्छा जागी।

दिसंबर 1961 में 80वें पायलट कोर्स के हिस्से के रूप में उन्हें भारतीय वायुसेना में कमीशन मिला। उन्होंने करीब सात साल तक सेवा की। इसके बाद दिसंबर 1968 में वह भारतीय वायुसेना से अलग हो गए और बाद में ऑस्ट्रेलिया में बस गए।

विदेश में रहने के बावजूद कुक का अपनी पूर्व स्क्वाड्रन से संबंध बना रहा और वह अक्सर भारत लौटते रहे।

उनकी पुरानी इकाई, नंबर 14 स्क्वाड्रन, जिसे ‘बुल्स’ के नाम से जाना जाता है, का गठन 1951 में हुआ था और शुरुआत में यह स्पिटफायर विमान संचालित करती थी। 1959 में इसने हंटर विमानों को अपने बेड़े में शामिल किया और बाद में 1965 तथा 1971 के युद्धों में इन्हीं विमानों का इस्तेमाल किया।

1979 में यह स्क्वाड्रन जगुआर स्ट्राइक विमान हासिल करने वाली भारतीय वायुसेना की पहली इकाई बनी और बाद में अंबाला स्थानांतरित हो गई।

प्रशिक्षण पुस्तिका से आगे
सितंबर 2015 में नंबर 14 स्क्वाड्रन की यात्रा के दौरान, अपने युद्ध अनुभव के करीब पांच दशक बाद, कुक ने सेवारत जवानों से युद्ध से मिली सीख साझा की।

उनका संदेश था कि तय प्रक्रियाओं में महारत हासिल करना जरूरी है, लेकिन पायलटों को अपने विमानों और विरोधी विमानों की क्षमताओं को भी अच्छी तरह समझना चाहिए, ताकि परिस्थितियों की मांग होने पर वे रचनात्मक ढंग से प्रतिक्रिया दे सकें।

कुक के लिए इस सोच की परीक्षा 1965 में कलाईकुंडा के ऊपर आसमान में हुई थी—10 मिनट चली उस मुठभेड़ के दौरान, जिसने उन्हें भारत के प्रतिष्ठित वीरता पुरस्कारों में से एक दिलाया और स्क्वाड्रन के युद्ध इतिहास का हिस्सा बना दिया।

By Rajeev Sharma

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