उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने इटानगर के न्येदार नामलो का किया दौरा, स्वदेशी संस्कृति के संरक्षण पर दिया जोर

नई दिल्ली(राजीव शर्मा):उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने आज इटानगर स्थित न्येदार नामलो का दौरा किया, जो अरुणाचल प्रदेश के न्याशी समुदाय और अन्य स्वदेशी समूहों के मूल डोनी-पोलो धर्म से जुड़ा एक पवित्र पूजा स्थल और सामुदायिक केंद्र है।

उपराष्ट्रपति ने प्रार्थना कक्ष में प्रार्थना की और उन्हें न्याशी स्वदेशी धर्म, मान्यताओं और प्रार्थना प्रणालियों, येर्को स्वदेशी गुरुकुल प्रणाली, पारंपरिक ज्ञान और औषधीय प्रणालियों के संरक्षण और मातृभाषा को बढ़ावा देने के प्रयासों के बारे में जानकारी दी गई।

एक सामुदायिक सभा को संबोधित करते हुए श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश की अपनी पहली यात्रा के दौरान न्येदार नामलो का दौरा करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे स्थान पर आकर गर्व महसूस हो रहा है “जहां परंपराएं आधुनिक सोच में परिवर्तित होती हैं, और आधुनिक सोच परंपराओं को नष्ट नहीं करती।”

उन्होंने अरुणाचल प्रदेश को भारत की विविधता में एकता का गौरवशाली प्रतीक बताया, जहां प्राचीन परंपराएं और आधुनिक आकांक्षाएं साथ-साथ चलती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अरुणाचल प्रदेश के लोग भारत की क्षेत्रीय अखंडता के गौरवशाली संरक्षक हैं।

उपराष्ट्रपति ने डोनी-पोलो परंपरा के मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रकृति, सत्य, सद्भाव और समुदाय पर इसकी ओर से जोर देना आधुनिक दुनिया के लिए अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक संरक्षण भी होना चाहिए।

न्याशी न्यिडुंग मुंग-ज्वंग रालुंग के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि प्रलेखन, शोध, पारंपरिक त्योहारों, सांस्कृतिक गतिविधियों और प्रथागत कानूनों और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण में इसका काम समुदाय के सांस्कृतिक भविष्य में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

उन्होंने येरको गुरुकुल प्रणाली का जिक्र करते हुए कहा कि यह समकालीन शिक्षा को स्वदेशी ज्ञान के साथ जोड़ने का एक महत्वपूर्ण मॉडल प्रस्तुत करती है, जिससे बच्चे अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक अवसरों को अपना सकते हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के “विकास भी, विरासत भी” के विजन के बारे में चर्चा करते हुए श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि आदिवासी समुदाय न केवल भारत के अतीत के संरक्षक हैं, बल्कि इसके भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भागीदार भी हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीय गौरव दिवस की मान्यता ने भारत के आदिवासी समुदायों के अमूल्य योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर फिर से उजागर किया है। उन्होंने स्वदेशी परंपराओं के संरक्षण को “वोकल फॉर लोकल” और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना से भी जोड़ा।

उन्होंने कहा, “स्वदेशी संस्कृति का संरक्षण किसी बदलाव का विरोध करना नहीं, बल्‍कि यह सुनिश्चित करना है कि परिवर्तन पहचान की कीमत पर न आए।”

उपराष्ट्रपति ने युवाओं से अपनी मातृभाषा और परंपराओं से जुड़े रहने के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और वैश्विक कौशल को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि भारत को अपनी आकांक्षाओं में आधुनिक होना चाहिए, लेकिन अपनी सभ्यतागत और सांस्कृतिक मूल्यों में गहराई से निहित होना चाहिए।

उन्होंने न्येदार नामलो आंदोलन को अपनी शुभकामनाएं दी और आशा व्यक्त करते हुए कहा कि यह पवित्र स्थान शांति, सद्भाव, प्रकृति के प्रति सम्मान, सामाजिक एकता और समुदाय की मजबूत भावना को प्रेरित करता रहेगा।

इस अवसर पर उपस्थित लोगों में अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) कैवल्य त्रिविक्रम परनाइक, मुख्यमंत्री श्री पेमा खांडू, उपमुख्यमंत्री श्री चोवना मीन, संसद सदस्य श्री ताई तागाक, गृह एवं स्वदेशी मामलों के मंत्री श्री मामा नटुंग और मुख्य सचिव श्री मनीष कुमार गुप्ता शामिल थे।

By Rajeev Sharma

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