डेराबस्सी में ‘आप’ के चार साल: विकास का दावा या अधूरे वादे?

डेराबस्सी (गुरप्रीत सिंह): जब आम आदमी पार्टी (आप) ने 2022 में पंजाब में प्रचंड जीत हासिल की थी, तो उसने जनता के समक्ष वादों की एक लंबी फेहरिस्त और सियासी बदलाव का पैगाम पेश किया था। सरकार ने सूबे का कायाकल्प करने, प्रशासनिक सुधार लागू करने, नशा मुक्ति और कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के बड़े-बड़े दावे किए थे।

चार साल से ज्यादा का अरसा बीत जाने के बाद डेराबस्सी विधानसभा क्षेत्र के अलग-अलग कोनों से अब यही सीधा सवाल उठ रहा है: क्या वादों में दिखाया गया वह बदलाव धरातल पर भी नजर आ रहा है?

रोजमर्रा की दुश्वारियों से दो-चार हो रहे स्थानीय लोगों के लिए सरकारी घोषणाओं और जमीनी हकीकत के दरमियान एक गहरी खाई बनी हुई है। खस्ताहाल सड़कें, ट्रैफिक जाम, जल निकासी का अभाव, बदहाल सार्वजनिक स्थल, रिश्वतखोरी के कथित आरोप और सुरक्षा से जुड़े मसले आज भी जनचर्चा का केंद्र बने हुए हैं।

नशे की समस्या अब भी गंभीर चिंता का विषय

पंजाब को नशामुक्त बनाना ‘आप’ सरकार के सबसे अहम चुनावी वादों में शुमार था।

इसके बावजूद, इलाके के लोग नशीले पदार्थों—विशेष रूप से सिंथेटिक ड्रग्स—की आसान पहुंच और खपत को लेकर फिक्रमंद हैं। स्थानीय बाशिंदे यह सवाल भी खड़े कर रहे हैं कि क्या नशा तस्करी के मामलों में होने वाली गिरफ्तारियां इस गिरोह को चलाने वाले मुख्य सरगनाओं के खिलाफ किसी ठोस नतीजे तक पहुंच पा रही हैं?

लोगों का कहना है कि अक्सर संदिग्ध पकड़े जाते हैं और कुछ ही अरसे बाद छूट जाते हैं। यही वजह है कि जनता यह जानने को उत्सुक है कि बार-बार अपराध दोहराने वालों के खिलाफ आखिर क्या सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जा रही है।

नशे की मार झेल रहे परिवारों के लिए यह कोई सियासी बयानबाजी नहीं, बल्कि घरों, बस्तियों और नौजवानों की तकदीर से जुड़ा एक संवेदनशील सामाजिक संकट है।

अपराध और कानून-व्यवस्था की जमीनी स्थिति

चोरी, छिनैती, हिंसक वारदातें और रंगदारी मांगने के आरोप सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलते नजर आते हैं।

‘आप’ ने कानून-व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के वादे पर वोट मांगे थे, मगर आलोचकों का मानना है कि हलका स्तर पर ऐसा कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं दिखा है जिसकी उम्मीद वोटरों ने बांधी थी।

यह मसला इसलिए भी बेहद संवेदनशील है क्योंकि कानून-व्यवस्था ऐसा पहलू है जिसका सीधा असर आम नागरिक के दैनिक जीवन पर पड़ता है।

विकास की रफ्तार बनाम गुणवत्ता

निजाम बदलने के साथ-साथ तेजतर्रार विकास का भी भरोसा दिया गया था। लेकिन अब डेराबस्सी में न सिर्फ निर्माण कार्यों की रफ्तार पर, बल्कि उनकी गुणवत्ता और टिकाऊपन पर भी उंगलियां उठ रही हैं।

क्षेत्र की कई अहम सड़कें आज भी मरम्मत की बाट जोह रही हैं। बरसात के मौसम में जलभराव और पानी की निकासी न होना लोगों के लिए जी का जंजाल बन जाता है।

मुबारकपुर के नजदीक रेलवे अंडरपास उन चिन्हित जगहों में शामिल है जहां मूसलाधार बारिश के दौरान बार-बार पानी भर जाता है। इसके अलावा, घग्गर नदी में जलस्तर बढ़ने पर बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। बाढ़ जैसे हालात पैदा होने पर ढकोली और मुबारकपुर को जोड़ने वाले पुल पर पानी फिर जाता है, जिससे राहगीरों और मुसाफिरों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो जाती है।

ट्रैफिक जाम: अनसुलझी पहेली

डेराबस्सी में रोजमर्रा सफर करने वालों के लिए ट्रैफिक जाम आम दिनचर्या बन चुका है। एक व्यस्त परिवहन गलियारे पर बसे होने के कारण इस तेजी से विकसित हो रहे हलके में सुचारू ट्रैफिक व्यवस्था बेहद जरूरी है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि बढ़ती आबादी और वाहनों की तादाद के अनुपात में ढांचागत नियोजन तैयार नहीं किया जा रहा।

भ्रष्टाचार का सवाल

‘आप’ ने भ्रष्टाचार पर नकेल कसने और सरकारी दफ्तरों में पारदर्शिता लाने के वादे के दम पर सत्ता संभाली थी। बहरहाल, कुछ बाशिंदे कथित अघोषित लेन-देन को लेकर अब भी खासे खफा हैं। जमीन-जायदाद से जुड़े कामों, मसलन प्लॉटों की रजिस्ट्री और अन्य दस्तावेजी प्रक्रियाओं में लोगों का आरोप है कि उनसे “चढ़ावे” की मांग की जाती है।

यद्यपि ऐसे आरोपों की पुष्टि जांच और ठोस सबूतों पर निर्भर करती है, फिर भी आम अवाम के बीच ऐसी धारणा का कायम रहना ही समूची व्यवस्था पर जनता के भरोसे को कमजोर करता है।

क्या चुनावी घोषणाओं की कोई कानूनी जवाबदेही हो सकती है?

यह समूचा परिदृश्य इस बहस के पीछे छिपे एक बड़े बुनियादी सवाल को सतह पर लाता है।

सियासी दल चुनावों से ऐन पहले घोषणापत्र जारी करते हैं, मगर जब वादे कागजों तक सीमित रह जाएं तो क्या चारा बचता है? मुल्क भर में लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि चुनावी मैनिफेस्टो को कानूनी दर्जा दिया जाए ताकि हुकूमतों को जवाबदेह ठहराया जा सके। इसके पीछे तर्क सीधा है: वोटरों के पास बड़े वादों की तामीर सुनिश्चित कराने का कोई पुख्ता जरिया होना चाहिए।

मगर मौजूदा दौर में, चुनावी घोषणापत्र किसी कानूनी अनुबंध के बजाय महज एक इरादा-पत्र बनकर रह गया है। नतीजतन, डेराबस्सी के लोगों के लिए यह तकरार सिर्फ इस बात की नहीं है कि 2022 में क्या सब्जबाग दिखाए गए थे। असली मुद्दा यह है कि आज लोग अपनी आंखों के सामने क्या देख पा रहे हैं।

नशे का जाल, चरमराती कानून-व्यवस्था, बदहाल सड़कें, जलभराव, ट्रैफिक, अवैध खनन के आरोप, खेल मैदानों का टोटा और रिश्वतखोरी की शिकायतें भले अलग-अलग पहलू हों, लेकिन ये सभी एक ही बिंदु पर आकर ठहरते हैं: क्या महज वादे कर देना काफी है, या सरकारों की परख ठोस और दिखने वाले नतीजों से होनी चाहिए?

जैसे-जैसे पंजाब अगले चुनावी दौर की तरफ बढ़ रहा है, यह सवाल डेराबस्सी समेत पूरे सूबे के मतदाताओं के लिए और भी मौजूं होता जा रहा है।

By Gurpreet Singh

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