नई दिल्ली(राजीव शर्मा): स्वतंत्र राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया पर अपनी आलोचना तेज़ कर दी है। उनका आरोप है कि इस अभ्यास से बड़े पैमाने पर मतदाताओं के बाहर होने का खतरा है और आने वाले चुनावों में इससे संभावित रूप से BJP को फायदा हो सकता है।
सिब्बल ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की, खासकर तौर पर electoral rolls से “बल्क डिलीशन” (एक साथ बड़ी संख्या में नाम हटाने) को लेकर। उन्होंने दलील दी कि इस प्रक्रिया की न्यायिक जांच और करीब से निगरानी की ज़रूरत है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि असली मतदाताओं को सूचियों से हटाया न जाए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री झारखंड के गोड्डा जिले में मतदाताओं के नाम हटाने के कथित प्रयासों से जुड़ी एक रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दे रहे थे। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि BJP से जुड़े बूथ एजेंटों ने मतदाताओं को हटाने के लिए आवेदन जमा किए थे, जिनमें से कई का संबंध अल्पसंख्यक समुदाय से बताया गया।
फॉर्म 7 के आवेदनों पर सिब्बल ने उठाए सवाल
X पर एक पोस्ट में सिब्बल ने कथित टारगेटिंग को “बहिष्कार की राजनीति” बताया और सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप करने का आह्वान किया।
बाद में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने फॉर्म 7 के इस्तेमाल पर केंद्रित किया, जिसके ज़रिए electoral rolls में दर्ज नामों के खिलाफ आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं। सिब्बल का दावा है कि फॉर्म के समूह एक साथ जमा किए जा सकते हैं और उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि जिस रिपोर्ट का वे जिक्र कर रहे हैं, उसके मुताबिक जिन कई लोगों के नाम हटाने का प्रस्ताव था, वे सालों से उस इलाके में रह रहे थे। कुछ परिवार तो कथित तौर पर आज़ादी से पहले से वहां बसे हुए हैं।
सिब्बल ने तर्क दिया कि ऐसे मामले चुनावी प्रक्रिया की ईमानदारी को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करते हैं। उनका कहना था कि अदालतों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि SIR अभ्यास का हर कदम पूरी तरह तटस्थ तरीके से किया जा रहा है।
‘BJP जहां सत्ता में है, वहां क्या होता है?’
सिब्बल ने बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) की भूमिका को लेकर भी चिंता जाहिर की, जो electoral rolls के फील्ड-लेवल सत्यापन के लिए ज़िम्मेदार हैं।
उन्होंने झारखंड को उदाहरण के तौर पर पेश किया और कहा कि वहां के BLOs कथित तौर पर आपत्तियां उठा रहे हैं, क्योंकि राज्य सरकार BJP के विरोधी पार्टियों के नेतृत्व में है। उन्होंने सवाल किया कि क्या BJP के सत्ता में वाले राज्यों में भी ऐसी आपत्तियां सामने आएंगी।
सिब्बल के मुताबिक, BLO अक्सर सरकारी कर्मचारी होते हैं, जिनमें शिक्षक भी शामिल हैं, और वे अपनी ज़िम्मेदारियां निभाते समय संभावित दबाव का सामना कर सकते हैं। उन्होंने ज़ोर दिया कि यह हर अधिकारी पर लागू नहीं होता, लेकिन संस्थागत दबाव की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।
“जहां वे (BJP) सत्ता में हैं, वहां कौन आपत्ति उठाएगा?” उन्होंने पूछा, साथ ही इस मुद्दे पर जन ध्यान बढ़ाने का आह्वान किया।
बड़े पैमाने पर मतदाताओं के बाहर होने के दावे
सिब्बल ने देश के विभिन्न हिस्सों में मतदाताओं के बाहर होने से जुड़े आंकड़े भी पेश किए। उनका दावा है कि दिल्ली और उत्तर प्रदेश में electoral roll संशोधन प्रक्रिया के दौरान लाखों नाम हटाए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यों में बाहर किए गए नामों की कुल संख्या कई करोड़ में हो सकती है।
उन्होंने कहा कि डिलीशन का पैमाना इतना बड़ा है कि यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि हर मतदाता को अपने नाम हटाने को चुनौती देने और ज़रूरत पड़ने पर उसे वापस करवाने का सार्थक मौका मिले।
सांसद ने आगे आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर घूम रहे सबूत और राष्ट्रीय अखबारों में छपी रिपोर्ट्स से संकेत मिलता है कि कुछ बल्क डिलीशन अनुरोध राजनीतिक रूप से प्रेरित हो सकते हैं।
ये दावे सिब्बल और अन्य विपक्षी नेताओं द्वारा किए गए हैं और SIR अभ्यास को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद का हिस्सा बने हुए हैं।
विपक्ष ने चुनाव आयोग पर हमला तेज़ किया
सिब्बल की टिप्पणी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पूर्व पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा चुनाव आयोग पर ताज़ा हमला करने के एक दिन बाद आई।
खड़गे और गांधी ने पोल पैनल पर BJP के पक्ष में काम करने का आरोप लगाया और चुनावी प्रक्रियाओं में हेराफेरी का आरोप लगाते हुए “BJP कुर्सी बचाओ आयोग” और “वोट चोरी आयोग” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।
राहुल गांधी ने अलग से दावा किया है कि SIR प्रक्रिया के बाद महाराष्ट्र की ड्राफ्ट electoral rolls में दो करोड़ से ज़्यादा मतदाता छूट गए हैं। उनका आरोप है कि BJP चुनावी फायदा हासिल करने के लिए बार-बार अपनी रणनीति बदल रही है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मतदाताओं का कथित हटाया जाना लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए खतरा है और उन्होंने संशोधन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने का आह्वान किया है।
SIR बना बड़ा राजनीतिक विस्फोटक मुद्दा
electoral roll संशोधन को लेकर विवाद अब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभरा है। विपक्षी पार्टियां इस बात पर सवाल उठा रही हैं कि मतदाता सूचियों की जांच और अपडेट कैसे की जा रही है।
सिब्बल ने कहा कि जैसे-जैसे SIR उन राज्यों में किया जाएगा जो चुनाव की ओर जा रहे हैं, यह मुद्दा और भी अहम हो जाएगा। उन्होंने न्यायपालिका और जनता से प्रक्रिया की बारीकी से निगरानी करने का आह्वान किया, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पात्र मतदाताओं को बाहर न किया जाए।
चुनाव आयोग का यह अभ्यास electoral rolls का सत्यापन और अपडेट करने के उद्देश्य से किया जा रहा है, लेकिन विपक्षी पार्टियों ने डिलीशन के पैमाने और तरीके को लेकर चिंताएं जाहिर की हैं। प्रतिस्पर्धी दावे संशोधन प्रक्रिया आगे बढ़ने और अदालतें इस अभ्यास के पहलुओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार करने के साथ जांच के दायरे में बने रहने की उम्मीद है।
