नई दिल्ली(राजीव शर्मा): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से दिए गए स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में कहा कि माओवादी हिंसा खत्म होने के कगार पर है, लेकिन चेतावनी दी कि “दिमागी नक्सली” के रूप में एक अलग चुनौती उभर सकती है।
80वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि दशकों तक देश ने नक्सलवाद और माओवादी हिंसा के कारण कष्ट झेला, कई बड़े इलाक़े सशस्त्र संघर्ष की छाया में रहे।
प्रधानमंत्री ने वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में सुरक्षा बलों की कुर्बानियों को याद किया। उन्होंने कहा कि हजारों सुरक्षा कर्मियों ने नागरिकों की रक्षा और प्रभावित क्षेत्रों में शांति बनाए रखने के दौरान अपनी जानें गंवाईं।
मोदी ने कहा कि 2014 में उनकी सरकार के आने के बाद नक्सल हिंसा को खत्म करना एक बड़ी प्राथमिकता बना। उनके अनुसार, सतत प्रयासों से कई क्षेत्रों ने सशस्त्र विद्रोह की पकڑ से बाहर आकर विकास के अधिक अवसर पाए।
हालाँकि, प्रधानमंत्री ने कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद के खत्म होने का मतलब यह नहीं कि देश अपनी सतर्कता घटा ले। उन्होंने “बौद्धिक नक्सली” मानसिकता वाले लोगों का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि ऐसे तत्व सामाजिक मुद्दों का फायदा उठा कर अशांति फैला सकते हैं।
मोदी ने कहा कि “दिमागी नक्सली” समाज को प्रभावित करने और युवाओं को मुख्यधारा से दूर धकेलने के मौकों की तलाश कर सकते हैं। उन्होंने चौकसी की अपील की और नागरिकों से विभाजन और अस्थिरता पैदा करने के प्रयासों को पहचानने के लिए कहा।
प्रधानमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि अतीत में नक्सली विचारधारा प्रभावशाली संस्थाओं और नीति-निर्माण के घेरे में जगह बना चुकी है। उन्होंने कहा कि अब सरकार का फोकस उन युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाने पर है जो हिंसा या चरम विचारों से प्रभावित हुए हैं।
मोदी के यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और सामूहिक जिम्मेदारी पर केंद्रित व्यापक स्वतंत्रता दिवस संदेश का हिस्सा थे। उन्होंने कहा कि देश को शांति और प्रगति के मार्ग पर बनाए रखते हुए नागरिक सतर्क रहें।
