केंद्र ने शहरी जाम-निवारण नीति की घोषणा की, 48 शहरों के लिए रिंग रोड और बाईपास बनाए जाने की योजना

नई दिल्ली(राजीव शर्मा): शहरी भारत में बढ़ते यातायात जाम से निपटने के एक बड़े कदम के रूप में केंद्र ने एक व्यापक शहरी जाम-निवारण (Urban Decongestion) नीति पेश की है, जो 48 शहरों और राज्य-राजधानियों के आसपास रिंग रोड और बाईपास विकसित करने की रूपरेखा रखती है। यह पहल उन राष्ट्रीय राजमार्गों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने और अगले पांच दशकों में तेज़ी से बढ़ने वाले शहरों की तैयारी करने का उद्देश्य रखती है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने कहा कि बढ़ते ट्रैफिक व अनियंत्रित शहरी विस्तार ने हाईवे कॉरिडोर्स पर वाहन गतिशीलता को काफी धीमा कर दिया है, जिससे ईंधन की खपत बढ़ी है, लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ी है, यात्रा में देरी हुई है और पर्यावरणीय चिंताएँ उभरी हैं।
नई नीति का उद्देश्य पहुंच-नियंत्रित राष्ट्रीय राजमार्ग रिंग रोड और बाईपास विकसित करने के लिए एक संरचित ढाँचा तैयार करना है, साथ ही राज्य सरकारों के सहयोग से योजनाबद्ध शहरी विकास और बेहतर गतिशीलता प्रबंधन को बढ़ावा देना है।

तेजी से आवागमन और आर्थिक विकास पर ध्यान
मंत्रालय के अनुसार, नीति का लक्ष्य माल और यात्रियों के आवागमन में सुधार करना, परिवहन लागत घटाना, औद्योगिक विकास का समर्थन करना और शहरी केन्द्रों में जीवन स्तर को सुधारना है।
पाँच लाख से अधिक जनसंख्या वाले 83 शहरों के एक पूर्व आकलन में यह पाया गया कि 80 स्थानों में शहर की सीमाओं के भीतर हाईवे ट्रैफिक स्पीड 10 प्रतिशत से अधिक घट गई थी। जहाँ 32 शहरों में जाम-राहत परियोजनाएँ पहले से चल रही हैं, वहीं शेष 48 शहरों को भविष्य के हस्तक्षेप के लिए चिन्हित किया गया है।

राज्यों के लिए भागीदारी के कई मॉडल
राज्यों की भागीदारी बढ़ाने के लिए केंद्र ने भूमि अधिग्रहण के लिए एक लचीला वित्तपोषण तन्त्र प्रस्तावित किया है।
एक विकल्प के तहत केंद्र और राज्य भूमि अधिग्रहण लागत को समान रूप से साझा कर सकते हैं। विकल्पत: राज्य अधिग्रहण लागत का 25 प्रतिशत योगदान दे सकते हैं और इसके बदले में राज्य GST (SGST) घटक और खनिज रॉयल्टी के माध्यम से प्रतिपूर्ति प्राप्त कर सकते हैं।
नीति भूमि पूलिंग मॉडलों को भी बढ़ावा देती है, जिससे भूमि स्वामी परियोजनाओं के लिए भूमि का योगदान कर सकेंगे। राज्य सरकारों से यह भी अपेक्षा की जाएगी कि वे प्रस्तावित रिंग रोड और बाईपास कॉरिडोरों से सटे क्षेत्रों के विकास अनुमतियों को सुगम बनाएँ।

पहुंच-नियंत्रित कॉरिडोरों की योजना
सड़क किनारे अतिक्रमण और रिबन विकास को रोकने के लिए नीति के तहत सभी शहरी जाम-निवारण परियोजनाओं को पूर्णतः पहुंच-नियंत्रित कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जाएगा, जिनमें कम से कम चार लेन और बंद टोलिंग सिस्टम होंगे।
मंत्रालय का मानना है कि इन उपायों से माल और यात्री वाहनों के लिए दीर्घकालिक रूप से 100–120 किमी/घंटा की यात्रा गति बनाए रखने में मदद मिलेगी, जिससे हाईवे की दक्षता में उल्लेखनीय सुधार होगा।

कॉरिडोरों के साथ हरी बफ़र जोन
योजना के हिस्से के रूप में, राज्य सरकारें नए बाईपास और रिंग रोड के दोनों ओर 15 मीटर चौड़ी निषिद्ध विकास-ज़ोन (prohibited development zone) निर्धारित करेंगी। इन क्षेत्रों को नगर नियोजन नियमों के तहत हरित जोन के रूप में अधिसूचित किया जाएगा।
इन ज़ोन में केवल आवश्यक सार्वजनिक परिवहन सुविधाएँ, पानी, बिजली और सीवरेज जैसी उपयोगिता सेवाएँ तथा हरित अवसंरचना परियोजनाएँ ही अनुमति पाएँगी।

दीर्घकालिक शहरी नियोजन दृष्टि
अधिकारियों ने कहा कि नीति को 50 वर्षों के शहरीकरण परिदृश्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, यह मानते हुए कि भविष्य में जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विस्तार को समायोजित करने के लिए ऐसे बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता होगी।
परिवहन नियोजन को शहरी विकास के साथ समेकित कर, केंद्र आशा करता है कि एक अधिक कुशल राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क बनेगा, बड़े शहरों में जाम कम होगा और देशव्यापी सतत आर्थिक विकास का समर्थन मिलेगा।
सरकार का मानना है कि यह पहल न केवल यात्रियों के लिए यात्रा के अनुभव में सुधार करेगी बल्कि भारत की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को भी मजबूत बनाएगी, जिससे आने वाले वर्षों में परिवहन तेज़, सुरक्षित और लागत-कुशल बनेगा।

By Rajeev Sharma

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