नई दिल्ली(राजीव शर्मा): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के एक शताब्दी पूरा करने के अवसर पर सिविल सेवा भर्ती प्रक्रिया में व्यापक बदलाव की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया को भारत की बदलती जरूरतों और 2047 तक सामने आने वाली चुनौतियों के अनुरूप विकसित होना चाहिए।
UPSC के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि पिछले 100 वर्षों में आयोग की सबसे बड़ी उपलब्धि जनता का अर्जित विश्वास रहा है। उन्होंने कहा कि सरकारों, तकनीक और परीक्षा प्रणालियों में बड़े बदलाव हुए हैं, लेकिन संस्था में लोगों का भरोसा एक महत्वपूर्ण स्थायी तत्व बना रहा है।
प्रधानमंत्री ने याद किया कि 1926 में स्थापित आयोग ने शुरुआत में ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक प्राथमिकताओं के अनुरूप काम किया था। स्वतंत्रता के बाद इसकी भूमिका लोकतांत्रिक भारत की आकांक्षाओं और जरूरतों के अनुरूप हो गई। उन्होंने भारत की सिविल सेवाओं को राष्ट्र-निर्माण का महत्वपूर्ण साधन बनाने में सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को भी रेखांकित किया।
केवल योग्यता नहीं, उद्देश्य पर भी ध्यान
मोदी ने कहा कि आने वाले दो से ढाई दशक भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होंगे। उन्होंने कहा कि भर्ती प्रक्रिया के केंद्र में दो सिद्धांत होने चाहिए—“राष्ट्र प्रथम” और “नागरिक प्रथम”।
प्रधानमंत्री के अनुसार, परीक्षाओं में उम्मीदवार के ज्ञान और विश्लेषणात्मक क्षमता से अधिक का आकलन किया जाना चाहिए। इसमें यह समझने का प्रयास भी होना चाहिए कि कोई व्यक्ति सार्वजनिक सेवा में आने का निर्णय क्यों ले रहा है।
उन्होंने सुझाव दिया कि प्रशिक्षण शुरू करते समय उम्मीदवारों से सार्वजनिक सेवा में करियर चुनने के अपने कारण दर्ज करने को कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि बाद में जब वे बड़ी जिम्मेदारियां संभालें, तो यह रिकॉर्ड उन्हें अपने मूल उद्देश्य की याद दिला सकता है।
तकनीक आधारित भारत के लिए प्रशासकों की तैयारी
मोदी ने कहा कि शासन की प्रकृति तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रियल-टाइम डेटा और डिजिटल उपकरण सरकारों के काम करने के तरीके को बदल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि तकनीक अब बड़ी मात्रा में सूचनाओं का लगभग तुरंत विश्लेषण और प्रसंस्करण कर सकती है। वहीं, नागरिकों को सेवाओं और सूचनाओं तक अभूतपूर्व तेजी से पहुंच प्राप्त है। इसके परिणामस्वरूप लोग सरकारी विभागों से पारंपरिक प्रशासनिक समय-सीमा के अनुसार काम करने के बजाय अधिक तेज प्रतिक्रिया की अपेक्षा कर रहे हैं।
इस पृष्ठभूमि में उन्होंने कहा कि सिविल सेवा भर्ती प्रक्रिया में ऐसे लोगों की पहचान की जानी चाहिए, जो जटिल समस्याओं से निपटने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सूचना युद्ध तथा जलवायु न्याय जैसे उभरते मुद्दों के अनुरूप खुद को ढालने में सक्षम हों।
तेज परीक्षाएं समानता का उपाय
प्रधानमंत्री ने प्रतियोगी परीक्षाओं में होने वाली देरी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक चलने वाली चयन प्रक्रियाएं अभ्यर्थियों पर आर्थिक बोझ बढ़ा सकती हैं।
उन्होंने कहा कि परीक्षाओं में बार-बार देरी होने पर उम्मीदवारों को कोचिंग, आवास, परिवहन और अन्य खर्चों पर अधिक धन खर्च करना पड़ सकता है। इसलिए मोदी ने भर्ती संस्थाओं के लिए “समय की निश्चितता” को एक महत्वपूर्ण विचार बताया।
उन्होंने कहा कि UPSC पहले ही अपनी परीक्षा प्रक्रिया को करीब 100 दिन कम कर चुका है। उन्होंने इस बदलाव को “समानता सुधार” बताया, क्योंकि इससे उम्मीदवारों पर पड़ने वाले अतिरिक्त खर्च को कम किया जा सकता है।
‘जन-केंद्रित, सक्रिय और सुशासन’
मोदी ने कहा कि भारत की भावी सिविल सेवाओं को नागरिकों और जनहित से जुड़े परिणामों पर अधिक ध्यान देने के साथ काम करना होगा।
उन्होंने “जन-केंद्रित, सक्रिय और सुशासन” पर आधारित कार्य संस्कृति का खाका प्रस्तुत किया। साथ ही, उन्होंने जोर दिया कि प्रशासनिक सुविधा से पहले जनहित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
UPSC के दूसरे शताब्दी वर्ष में प्रवेश करने के साथ प्रधानमंत्री ने कहा कि भर्ती और प्रशिक्षण प्रणालियों को अधिक शहरी, तकनीक-उन्मुख भारत और नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाओं के अनुरूप आगे बढ़ना होगा।
