चंडीगढ़(गुरप्रीत सिंह): केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म सतलुज को लेकर जारी विवाद पर पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पंजाब के उग्रवाद के दौर पर होने वाली किसी भी चर्चा में इतिहास के केवल एक पक्ष पर नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम पर बात होनी चाहिए।
दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म सतलुज को हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटा दिया गया, जिसके बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। पंजाब की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) ने आरोप लगाया कि इस फैसले के पीछे बिट्टू की भूमिका थी। हालांकि केंद्रीय मंत्री ने इन आरोपों पर सीधे तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन उन्होंने अपने दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की विरासत का बचाव किया। साथ ही उन्होंने कहा कि फिल्म में राज्य के सबसे कठिन दौरों में से एक को सीमित नजरिए से दिखाया गया है।
द ट्रिब्यून को दिए एक इंटरव्यू में बिट्टू ने कहा कि पंजाब के उग्रवाद के वर्षों को केवल सरकार के खिलाफ लगाए गए आरोपों के आधार पर नहीं समझा जा सकता, जबकि सशस्त्र उग्रवादियों द्वारा की गई हिंसा को नजरअंदाज कर दिया जाए।
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा, जिनके लापता होने और हत्या की घटना फिल्म का मुख्य विषय है, का उल्लेख करते हुए बिट्टू ने फिल्म की कहानी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बेअंत सिंह के कार्यकाल के दौरान खालड़ा अपना अभियान जारी रखने और विदेश यात्रा करने में सक्षम थे। उनके अनुसार, उस दौर का मूल्यांकन करते समय इस पहलू पर भी सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने जोर देकर कहा कि उग्रवाद को कभी भी किसी धर्म या समुदाय से नहीं जोड़ना चाहिए। उनके अनुसार, हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों ने पुलिसकर्मियों, जनप्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों और आम नागरिकों को निशाना बनाया था। उन्होंने कहा कि उस दौर के हर पीड़ित को समान सम्मान और याद किया जाना चाहिए।
बिट्टू ने कहा कि जब बेअंत सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला, तब पंजाब व्यापक हिंसा और अस्थिरता से जूझ रहा था। उनके मुताबिक सरकार की पहली प्राथमिकता शांति बहाल करना और लोगों को भयमुक्त वातावरण देना था, ताकि उसके बाद विकास और सुशासन पर ध्यान दिया जा सके।
उन्होंने उस दौरान लोकतांत्रिक संस्थाओं के पुनर्जीवन का भी उल्लेख किया। उन्होंने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों को अशांति के वर्षों के बाद जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम बताया।
सुरक्षा बलों पर लगाए गए अत्याचारों के आरोपों, जिनमें महिलाओं से जुड़े दावे भी शामिल हैं, पर बिट्टू ने कहा कि ऐसे आरोपों का मूल्यांकन सत्यापित साक्ष्यों और विश्वसनीय रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल धारणाओं के आधार पर। उन्होंने कहा कि इतिहास पर चर्चा तथ्यों और दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, न कि चुनिंदा कथाओं के आधार पर।
उग्रवाद के दीर्घकालिक प्रभाव का जिक्र करते हुए बिट्टू ने कहा कि पंजाब ने हजारों लोगों की जान गंवाई, परिवार बिखर गए, कारोबार प्रभावित हुए और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने कहा कि पूरी एक पीढ़ी ने लंबे समय तक चली हिंसा की भारी कीमत चुकाई।
आज के दौर में गैंगस्टरों और संगठित अपराध को लेकर बढ़ती चिंताओं का जिक्र करते हुए बिट्टू ने कहा कि उग्रवाद के समय लोगों के बीच भय कहीं अधिक गहरा था। उन्होंने चेतावनी दी कि पंजाब को किसी भी रूप में हिंसा की वापसी नहीं होने देनी चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने फिल्म का समर्थन करने वालों से भी सवाल किया कि क्या वे आज खालिस्तान के विचार का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि इसका उत्तर ‘नहीं’ है, तो उसके नाम पर हुई हिंसा को भी खारिज किया जाना चाहिए और राज्य के शांतिपूर्ण भविष्य के लिए मिलकर काम करना चाहिए।
बिट्टू ने अतीत को भावनात्मक नजरिए से देखने के प्रति भी आगाह किया। उन्होंने कहा कि जिन्होंने वह दौर देखा है, वे आज भी उस समय के भय, अनिश्चितता और रोजमर्रा की हिंसा को नहीं भूले हैं। उन्होंने कहा कि आज पंजाब की प्राथमिकताएं रोजगार, शिक्षा, निवेश और स्थिरता होनी चाहिए, न कि पुराने घावों को फिर से खोलना।
अपनी बात समाप्त करते हुए बिट्टू ने कहा कि इतिहास पर बहस हो सकती है और होनी भी चाहिए, लेकिन हिंसा का महिमामंडन कभी नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, पंजाब की सबसे बड़ी उपलब्धि वर्षों के संघर्ष के बाद शांति और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली थी।
