चीता परियोजना: मजबूत प्रगति और उज्ज्वल भविष्य दर्शाती है भारत की ऐतिहासिक वन्यजीव पुनर्स्थापन पहल

दिल्ली(राजीव शर्मा):पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में आज चीता परियोजना की उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें कार्यक्रम की प्रगति का आकलन किया गया और भविष्य की कार्ययोजना पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) के वरिष्ठ अधिकारी, परियोजना विशेषज्ञ और देश में वन्यजीव संरक्षण से जुड़े वरिष्ठ प्रक्षेत्र अधिकारी उपस्थित थे।

चीता परियोजना भारत में चीतों के विलुप्त होने के बाद उन्हें पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू की गई एक अग्रणी पहल है। इस कार्यक्रम की शुरुआत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से 20 चीतों के एक संस्थापक समूह को स्थानांतरित करके की गई थी, जिसमें समन्वित अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैज्ञानिक योजना के माध्यम से बोत्सवाना से 9 चीतों को और शामिल किया गया।

वन्यजीवों के स्थानांतरण से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद, इस परियोजना ने उत्साहजनक परिणाम दर्ज किए हैं। वर्तमान में चीतों की संख्या 53 है, जिनमें से 33 भारत में जन्मे हैं। यह भारतीय परिस्थितियों में सफल अनुकूलन और प्रजनन के कारण हुई महत्वपूर्ण वृद्धि को दर्शाता है। स्थानांतरित किए गए चीतों और उनके शावकों की उत्तरजीविता दर वैश्विक मानकों के बराबर पाई गई है। कुछ मामलों में तो यह उनसे बेहतर भी है, जो वैज्ञानिक प्रबंधन और निगरानी प्रोटोकॉल की प्रभावशीलता को प्रदर्शित करता है।

कार्यान्वयन कार्यलिपी दीर्घकालिक स्थिरता के लिए भूदृश्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाती है। कुनो राष्ट्रीय उद्यान को आबादी की स्थापना के लिए प्राथमिक स्थल के रूप में विकसित किया गया है, जबकि गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य को आगे विस्तार के लिए एक अतिरिक्त पर्यावास के रूप में तैयार किया गया है। ये स्थल मध्य भारत में फैले एक बड़े परस्पर जुड़े भूदृश्य का हिस्सा हैं, जो फैलाव और आनुवंशिक आदान-प्रदान को सुगम बनाते हैं। गुजरात के बन्नी घास के मैदानों सहित नए क्षेत्रों में परियोजना का विस्तार करने के लिए भी तैयारी कार्य चल रहा है, जहां पर्यावास की अनुकूलता और शिकार संवर्धन उपाय संतोषजनक स्तर पर पहुंच गए हैं।

वैज्ञानिक निगरानी से पता चलता है कि चीते भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल अच्छी तरह से ढल रहे हैं। उनका विचरण स्थिर है, वे शिकार का प्रभावी ढंग से उपयोग करते हैं और विभिन्न प्रबंधन व्यवस्थाओं में कोई महत्वपूर्ण शरीर संबंधी तनाव नहीं देखा गया है।

परियोजना के अगले चरण में अतिरिक्त स्थानांतरणों के माध्यम से समेकन और विस्तार, मध्य प्रदेश में नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य जैसे नए स्थलों का विकास और चिन्हित भूभागों में एक मेटापॉपुलेशन ढांचे को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने और आबादी वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए अफ्रीकी देशों से चीतों की निरंतर आपूर्ति की परिकल्पना की गई है।

चीता परियोजना लगातार प्रगति कर रही है और वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण संरक्षण पहल के रूप में उभर रही है। निरंतर वैज्ञानिक मार्गदर्शन, संस्थागत सहयोग और समन्वित कार्यान्वयन के साथ, यह परियोजना दीर्घकालिक सफलता के लिए अच्छी स्थिति में है और देश में चीता संरक्षण और खुले प्राकृतिक इकोसिस्टम के पुनर्स्थापन में महत्वपूर्ण योगदान देने की उम्मीद है।

By Rajeev Sharma

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