दिल्ली(राजीव शर्मा):देशभर के उपभोक्ताओं को सोमवार को एक और झटका लगा जब सार्वजनिक और निजी तेल कंपनियों ने पेट्रोल व डीजल की कीमतों में चौथी बार दो सप्ताह से भी कम समय में वृद्धि कर दी। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत पुनः ₹100 प्रति लीटर पार होकर अब ₹102.12 हो गई, जबकि डीजल की दर बढ़कर ₹95.20 प्रति लीटर पहुंच गई।
ईंधन विक्रेताओं के अनुसार पेट्रोल में प्रति लीटर ₹2.61 और डीजल में ₹2.71 की बढ़ोतरी की गई है। इस समायोजन के बाद मई के मध्य से अब तक ईंधन की कीमतों में कुल वृद्धि लगभग ₹7.5 प्रति लीटर के आसपास पहुँच चुकी है, जिससे घरेलू खर्च और परिवहन लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
मेट्रो शहरों में भी रिकार्ड दरें देखी गईं; मुंबई में पेट्रोल अब ₹111 प्रति लीटर से ऊपर गया जबकि डीजल लगभग ₹98 के आसपास पहुंच गया। कोलकाता और चेन्नई में भी स्थानीय करों के प्रभाव के कारण दरों में विविधता जारी रही।
विश्लेषकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, उच्च रिफाइनिंग लागत और रूपये की कमजोरी प्रमुख कारण हैं, जिनकी वजह से देश का आयात बिल बढ़ा है। वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में तनाव और स्त्रीट आफ हॉर्मुज सहित प्रमुख सप्लाई मार्गों में व्यवधानों से कच्चे तेल की आपूर्ति-संभावनाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे दामों में तेजी आई है।
सरकारी तेल कंपनियों ने वैश्विक उतार-चढ़ाव के बावजूद कुछ समय पहले कीमतों में दीर्घकालीन ठहराव बनाए रखा था, जिसे सरकार ने अचानक महंगाई से उपभोक्ताओं की सुरक्षा बताकर उचित ठहराया। हालांकि विपक्ष ने इन बढ़ौतियों के समय पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि समायोजन बड़ी चुनावी घटनाओं के बाद किए गए।
इस माह की शुरुआत में 15 मई को पहली बार ₹3 प्रति लीटर की वृद्धि की गई थी, जिसके बाद 19 और 23 मई को और संशोधन किए गए। सोमवार का समायोजन इस श्रृंखला का सबसे बड़ा माना जा रहा है।
देश के प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के ईंधन विक्रेता—इंडियन ऑयल, भरत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम—बाजार में नेतृत्व करते हैं और सामान्यत: इनके द्वारा तय कीमतें अन्य निजी विक्रेताओं द्वारा अपनाई जाती हैं। कुछ निजी कंपनियां पहले ही दरें बढ़ा चुकी थीं; हाल के सुधारों के बाद बाकी खिलाड़ी भी इन्हीं स्तरों के अनुरूप हो गए हैं।
आर्थिक विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ईंधन की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो इससे माल ढुलाई दरों, खाद्य कीमतों और उपभोक्ता खर्च पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ने का जोखिम बना रहेगा।
