नई दिल्ली(राजीव शर्मा):राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने नई दिल्ली स्थित अपने परिसर में हाइब्रिड मोड में ‘प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा: सरकार और निजी क्षेत्र की साझा जिम्मेदारी’ विषय पर अपने कोर ग्रुप की बैठक की। बैठक की अध्यक्षता करते हुए एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन ने कहा कि अन्य श्रमिकों की तुलना में प्रवासी श्रमिकों को अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है क्योंकि उनमें से अधिकांश असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। भाषा की बाधाएं, आवागमन की अस्थिरता और स्थायी आवास की कमी उन्हें संगठित रूप से अपने अधिकारों की रक्षा करने से रोकती है। उन्होंने श्रमिकों के अधिकारों के लिए ट्रेड यूनियनों की मजबूत परंपरा को भी याद किया। बैठक में एनएचआरसी सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी, महासचिव श्री भरत लाल, महानिदेशक (जांच) श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्र, रजिस्ट्रार (कानून) श्री जोगिंदर सिंह, संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार और श्रीमती सैदिंगपुई छकछुआक, भारत सरकार के वरिष्ठ पदाधिकारी, प्रख्यात क्षेत्र विशेषज्ञ और संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न निकायों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन ने प्रवासी श्रमिकों को मान्यता देने वाले 1979 के कानून और लगातार 240 दिनों के काम के बाद संरक्षण प्रदान करने वाले औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्रावधानों जैसे कानूनों का उल्लेख किया, साथ ही पात्रता अवधि से पहले नियोक्ताओं द्वारा दिए जाने वाले अवकाश जैसी खामियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने सरकारों को सलाह देने में भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और उसके कोर ग्रुप की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यद्यपि भारत में 1979 से प्रवासी श्रमिकों के संरक्षण सहित मजबूत श्रम कानून हैं, फिर भी उनका कार्यान्वयन चिंता का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रवासी श्रमिकों की समस्याएं सर्वविदित हैं और आयोग को उम्मीद है कि विभिन्न हितधारकों के साथ चर्चा के परिणामस्वरूप केंद्र और राज्य सरकारों को कार्यान्वयन के लिए व्यावहारिक समाधानों के रूप में सिफारिशें दी जाएंगी।
न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन ने प्रवासी श्रमिकों के लिए अनुपालन-आधारित दृष्टिकोण से अधिकार-आधारित संस्कृति की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने राज्यों के बीच समन्वय, सुगम्य सामाजिक सुरक्षा और श्रम कानूनों के सुदृढ़ कार्यान्वयन जैसे प्रणालीगत सुधारों पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि तत्काल ध्यान निर्माण, होटल, व्यवसाय और घरेलू काम में लगे प्रवासी कामगारों पर केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रवासी कामगारों के लिए बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए भाषाई पहचान पर आधारित संगठनों के सदस्यों को समन्वय परिषदों में शामिल किया जाना चाहिए।
