चंडीगढ़(गुरप्रीत सिंह): पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा है कि बुजुर्ग कैदियों की ओर से दायर जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते समय न्यायाधीशों को उनकी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, खासकर तब जब आरोपी की उम्र 75 वर्ष से अधिक हो।
न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति हरमीत सिंह देओल की पीठ ने धनशोधन मामले में पांच साल से अधिक समय से हिरासत में बंद 76 वर्षीय व्यक्ति को अंतरिम जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने कहा कि जब 75 वर्ष से अधिक उम्र का कोई आरोपी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहा हो और हिरासत में रह रहा हो, तो संबंधित न्यायाधीश को उसकी स्थिति पर “अत्यंत सहानुभूति और चिंता” के साथ विचार करना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में यदि जमानत से इनकार किया जाता है, तो अदालत को इसके स्पष्ट कारण दर्ज करने चाहिए।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि आरोपी इतना शारीरिक रूप से कमजोर हो गया है कि वह अपनी बुनियादी व्यक्तिगत जरूरतों को भी पूरा करने में सक्षम नहीं है। वकील ने कहा कि उसे लगातार जेल में रखना आरोपी और उसके परिवार के लिए अपूरणीय क्षति का कारण बन सकता है।
यह भी दलील दी गई कि आरोपी के फरार होने का कोई खतरा नहीं है। बचाव पक्ष के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पास मामले से संबंधित सभी दस्तावेजी साक्ष्य पहले से मौजूद हैं। ऐसे में आरोपी को लगातार हिरासत में रखने का पर्याप्त आधार नहीं बचता।
बचाव पक्ष ने आरोपी की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति का भी हवाला दिया और कहा कि जेल से बाहर उचित उपचार से वंचित रखना उसके लिए गंभीर और अपूरणीय परिणाम पैदा कर सकता है।
याचिका पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि अधिक उम्र और खराब स्वास्थ्य के कारण लगातार जेल में रहना बुजुर्ग व्यक्ति के लिए बेहद कठोर हो सकता है। अदालत ने कहा कि बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदियों को जमानत देने से इनकार करना अमानवीय हो सकता है। हालांकि, ऐसी स्थिति में अपवाद हो सकते हैं, जब आरोपी बार-बार अपराध करने वाला हो, उसके फरार होने का वास्तविक खतरा हो, अपराध अत्यंत गंभीर हो या अपराध इतना जघन्य हो कि रिहाई से समाज के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता हो।
पीठ ने कारावास के व्यापक उद्देश्य पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि जेल में रखने के कई उद्देश्य होते हैं, जिनमें निवारण, दंड, समाज की सुरक्षा और कानून के प्रति सम्मान को मजबूत करना शामिल हैं।
हालांकि, अदालत ने कहा कि आधुनिक जेल व्यवस्था के महत्वपूर्ण सिद्धांत पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण का उद्देश्य उस समय काफी हद तक समाप्त हो जाता है, जब कोई बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदी जीवन के अंतिम चरण के करीब हो।
ईडी ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 45 में निर्धारित दोहरी शर्तें पूरी नहीं हुई हैं। एजेंसी ने यह भी कहा कि आरोपी ने वर्ष 2016 से समन से बचने की कोशिश की थी और रिहा होने पर उसके फरार होने का खतरा हो सकता है।
एजेंसी ने आगे आरोप लगाया कि भारत में संपत्तियां आरोपी के बेटे के नाम पर खरीदी गई थीं। आरोपी का बेटा भी इस मामले में आरोपों का सामना कर रहा है और उसके बारे में कहा गया कि वह फरार है।
बचाव पक्ष की ओर से बताए गए चिकित्सकीय आधार पर ईडी ने कहा कि आरोपी को न्यायिक हिरासत के दौरान पहले से ही उपचार मिल रहा है। एजेंसी ने रीढ़ की हड्डी की सर्जरी समेत उपलब्ध कराई गई चिकित्सा सुविधाओं का हवाला दिया और कहा कि जरूरत पड़ने पर आरोपी को सरकारी अस्पताल ले जाया जा सकता है।
हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि ईडी ने आरोपी की स्वास्थ्य स्थिति पर विशेष रूप से कोई विवाद नहीं किया है। एजेंसी का जवाब मुख्य रूप से कथित अपराध की गंभीरता, पहले गुण-दोष के आधार पर जमानत खारिज होने और आरोपी के फरार होने की आशंका पर केंद्रित था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि वह धनशोधन मामले में आरोपी को गुण-दोष के आधार पर जमानत दिए जाने के सवाल पर फैसला नहीं कर रही है। अदालत का विचार केवल उसकी स्वास्थ्य स्थिति और लंबे समय से जारी हिरासत तक सीमित है।
17 अगस्त के हिरासत प्रमाणपत्र का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस मामले में पहले ही पांच साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है।
पीठ ने इसके बाद कहा कि आरोपी न केवल अधिक उम्र और खराब स्वास्थ्य के कारण, बल्कि लंबे समय तक हिरासत में रहने के आधार पर भी राहत का हकदार है।
अदालत ने आगे कहा कि पीएमएलए की धारा 45 की कठोर शर्तें किसी व्यक्ति के जीवन के मौलिक अधिकार पर हावी नहीं हो सकतीं, जब उसकी स्वास्थ्य स्थिति इतनी गंभीर हो कि जेल के भीतर सार्थक उपचार उपलब्ध कराना संभव न हो।
पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में लगातार हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का उल्लंघन कर सकता है।
हाई कोर्ट ने 76 वर्षीय आरोपी को 21 दिसंबर तक अंतरिम जमानत दे दी। साथ ही, अदालत ने कहा कि यदि उसकी स्वास्थ्य स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो वह जमानत की अवधि बढ़ाने का अनुरोध कर सकता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश का आपराधिक मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
