केंद्र ने चंडीगढ़ की डीलिस्ट (सूची से हटाई गई) पर व्यावसायिक परियोजनाओं का विरोध किया, वन संरक्षण नियमों पर बल दिया

चंडीगढ़ (गुरप्रीत सिंह): केंद्र का पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने दोहराया है कि चंडीगढ़ के आसपास PLPA (पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम) के दायरे से निकाली गई भूमि का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सकता और इस क्षेत्र की पारिस्थितिक प्रकृति संरक्षित रखी जानी चाहिए।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में दायर एक हलफनामे में मंत्रालय ने कहा कि ऐसी डीलिस्ट भूमि पर कोई भी व्यावसायिक गतिविधि 2009 में केंद्र द्वारा दी गई मंजूरी की शर्तों के विपरीत होगी। यह हलफनामा चंडीगढ़ परिधि में कथित अनधिकृत निर्माण से जुड़े एक चल रहे मामले के संदर्भ में दाखिल किया गया है।

मंत्रालय ने बताया कि वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत वन भूमि पर की जाने वाली किसी भी गैर-वानिकी गतिविधि के लिए केंद्र की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य रहती है। उसने ज़ोर देकर कहा कि 2009 के निर्णय से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था अनियंत्रित शहरीकरण को रोकने और शहर के चारों ओर संवेदनशील पर्यावरणीय परिदृश्यों की रक्षा के लिए थी।

केंद्र ने PLPA के दायरे से 55,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि एवं आबादी वाली भूमि को बाहर करने की अनुमति दी थी। हालांकि यह मंजूरी विशिष्ट दायरों के साथ आई थी। इन शर्तों में भूमि का उपयोग केवल वास्तविक कृषि प्रयोजनों और आजीविका से जुड़े कार्यों तक सीमित रखना और यदि किसी डीलिस्ट क्षेत्र में गलती से वन भूमि आ गई हो तो उसकी कानूनी सुरक्षा बनाए रखना शामिल था।

मंत्रालय ने अधिकरण को बताया कि ऐसी भूमि का व्यावसायिक प्रतिष्ठान, आवासीय कॉलोनियां या अन्य लाभ-उन्मुख विकास में रूपांतरण उन शर्तों का उल्लंघन माना जाएगा। मंत्रालय का कहना है कि मूल सुरक्षा उपाय वैध हैं और कड़ाई से लागू होने चाहिए।

स्थिति की स्पष्ट तस्वीर जानने के लिए मंत्रालय ने पंजाब सरकार से प्रभावित क्षेत्रों में कथित उल्लंघनों के संबंध में तथ्यात्मक रिपोर्ट व दस्तावेजी साक्ष्य माँगे हैं। अधिकारियों से यह भी जानकारी देने को कहा गया है कि वन संरक्षण नियमों के कितने उल्लंघन दर्ज हुए हैं।

इसी बीच, ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMADA) ने NGT को सूचित किया है कि मिर्जापुर, जयंती माजरी, करोरां और सिसवां गांवों में दर्जनों कथित अनधिकृत संरचनाओं के विरुद्ध कार्रवाई की जा चुकी है। प्राधिकरण ने बताया कि 62 निर्माणों पर पहले ही कार्रवाई हुई है और सितंबर 2025 से अनधिकृत विकास को रोकने के लिए 92 अतिरिक्त कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं।

हलफनामे में पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के प्रावधानों का भी जिक्र किया गया है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि निर्दिष्ट सीमाएँ पार करने वाली बड़े स्तरीय निर्माण परियोजनाओं और टाउनशिपों के लिए विकास से पहले पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी आवश्यक है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि NGT ने डीलिस्ट क्षेत्रों पर लागू पंजाब की फार्महाउस नीति पर पहले ही अंतरिम रोक लगा रखी है। उसी क्षेत्र के लिए पर्यटन विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘फार्म‑स्टे’ नीति से जुड़ा अलग मामला भी अधिकरण के समक्ष विचाराधीन है।

चंडीगढ़ की हरियाली पट्टी और सन्निहित गांवों को लेकर पर्यावरणीय चिंताएँ न्यायिक समीक्षा के घेरे में बढ़ती जा रही हैं, और प्राधिकरण यह जाँच कर रहे हैं कि क्या विकास गतिविधियाँ पर्यावरण व भूमि‑उपयोग नियमों के अनुरूप की जा रही हैं।

By Gurpreet Singh

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